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आपातकाल की बरसी: लोकतांत्रिक सजगता और प्रतिरोध के सबक को याद रखना क्यों जरूरी?

ICN24 Newsroom 4 जुल॰ 2026, 06:31 am
आपातकाल की बरसी: लोकतांत्रिक सजगता और प्रतिरोध के सबक को याद रखना क्यों जरूरी?

1975 के आपातकाल की बरसी पर भारत और विदेशों में रहने वाले भारतीय समुदाय ने लोकतंत्र की रक्षा और नागरिक अधिकारों के प्रति सजगता का आह्वान किया है।

25 जून, 1975 का दिन भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक काले अध्याय के रूप में दर्ज है। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा लगाए गए आपातकाल के 49 साल बाद भी, इसके सबक आज के दौर में उतने ही प्रासंगिक हैं जितने तब थे। विशेषज्ञों और नागरिक समाज के प्रतिनिधियों का मानना है कि नई पीढ़ी को आपातकाल के इतिहास से अवगत कराना अनिवार्य है ताकि वे भविष्य में लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति किसी भी खतरे को पहचान सकें और उनके खिलाफ आवाज उठा सकें। आपातकाल के दौरान 21 महीनों तक भारत में नागरिक अधिकारों को निलंबित कर दिया गया था। प्रेस पर सेंसरशिप थोपी गई, विपक्षी नेताओं को बिना किसी मुकदमे के जेलों में डाल दिया गया और न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर प्रहार किया गया। यह वह दौर था जब दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की नींव डगमगाने लगी थी। ऑस्ट्रेलिया में बसे भारतीय समुदाय के लिए भी यह विषय विशेष महत्व रखता है, क्योंकि यहाँ का प्रवासी समाज अक्सर मानवाधिकारों और लोकतांत्रिक मूल्यों की वकालत करता रहा है। सिडनी और मेलबर्न जैसे प्रमुख ऑस्ट्रेलियाई शहरों में रहने वाले प्रबुद्ध वर्ग का मानना है कि लोकतंत्र केवल चुनाव तक सीमित नहीं है। यह संस्थाओं की स्वायत्तता और असहमति की आवाज को जगह देने का नाम है। ऑस्ट्रेलिया में पली-बढ़ी नई भारतीय पीढ़ी के लिए यह समझना जरूरी है कि उनके पूर्वजों ने जिस लोकतंत्र को संवारा है, वह कितनी मुश्किलों से हासिल हुआ था। इतिहास को याद रखने का उद्देश्य केवल अतीत की आलोचना करना नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य के लिए 'प्रहरी' की भूमिका निभाना है। आज के वैश्विक परिदृश्य में, जहाँ दुनिया के कई हिस्सों में 'सॉफ्ट ऑटोक्रेसी' या छद्म अधिनायकवाद के लक्षण दिखाई देते हैं, आपातकाल की स्मृतियां एक चेतावनी के रूप में कार्य करती हैं। लोकतांत्रिक क्षितिज के संकुचित होने की प्रक्रिया अक्सर धीमी और अदृश्य होती है। नागरिक स्वतंत्रता का हनन रातों-रात नहीं होता, बल्कि यह धीरे-धीरे संवैधानिक संस्थाओं के कमजोर होने से शुरू होता है। इसलिए, 'सजगता' ही वह एकमात्र हथियार है जिससे लोकतंत्र को बचाया जा सकता है। ICN24 से बात करते हुए, समुदाय के वरिष्ठ सदस्यों ने जोर दिया कि शैक्षिक पाठ्यक्रमों और विमर्शों में आपातकाल के संघर्ष को प्रमुखता मिलनी चाहिए। जब तक युवा यह नहीं समझेंगे कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता खोने का क्या अर्थ होता है, तब तक वे इसकी रक्षा के प्रति गंभीर नहीं होंगे। अंततः, 1975 के प्रतिरोध की कहानी हमें सिखाती है कि जनता की सामूहिक इच्छाशक्ति किसी भी तानाशाही शक्ति से बड़ी होती है।
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