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जुबली कुमार राजेंद्र कुमार: हिंदी सिनेमा के उस स्वर्णिम युग की यादें जो आज भी जीवंत हैं
ICN24 Newsroom 12 जुल॰ 2026, 10:31 am

हिंदी सिनेमा के दिग्गज अभिनेता राजेंद्र कुमार की पुण्यतिथि पर एक विशेष श्रद्धांजलि। जानिए क्यों उन्हें 'जुबली कुमार' कहा जाता था और ऑस्ट्रेलिया में बसे भारतीय समुदाय के बीच उनकी फिल्मों का क्या महत्व है।
भारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं जिन्हें समय की धूल कभी धुंधला नहीं कर सकती। इन्हीं नामों में से एक है राजेंद्र कुमार, जिन्हें फिल्म जगत और उनके चाहने वाले आज भी 'जुबली कुमार' के नाम से याद करते हैं। 12 जुलाई, 1999 को दुनिया को अलविदा कह देने वाले इस महान अभिनेता की पुण्यतिथि पर आज पूरा देश और विदेशों में बसा भारतीय समुदाय उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दे रहा है। राजेंद्र कुमार केवल एक अभिनेता नहीं थे, बल्कि वे 1960 के दशक के उस दौर के प्रतीक थे, जब सिनेमा केवल मनोरंजन नहीं बल्कि भावनाओं का प्रतिबिंब हुआ करता था।
राजेंद्र कुमार का जन्म 20 जुलाई, 1927 को अविभाजित भारत के सियालकोट (अब पाकिस्तान में) में हुआ था। विभाजन की त्रासदी झेलते हुए वे अपने परिवार के साथ मुंबई आए। बिना किसी फिल्मी पृष्ठभूमि के, उन्होंने कड़ा संघर्ष किया और अपनी प्रतिभा के दम पर सफलता की ऊंचाइयों को छुआ। उनकी सफलता का आलम यह था कि 1960 के दशक में उनकी लगातार कई फिल्में सिनेमाघरों में 25 सप्ताह (सिल्वर जुबली) से अधिक समय तक चलती थीं। इसी कारण उन्हें 'जुबली कुमार' का खिताब दिया गया। 'मदर इंडिया', 'संगम', 'मेरे महबूब', 'दिल एक मंदिर' और 'आरजू' जैसी फिल्मों ने उन्हें सुपरस्टार की श्रेणी में खड़ा कर दिया।
ऑस्ट्रेलिया में बसे भारतीय समुदाय के लिए राजेंद्र कुमार की फिल्में केवल पुरानी यादें नहीं हैं, बल्कि वे एक सांस्कृतिक सेतु का कार्य करती हैं। सिडनी, मेलबर्न और ब्रिस्बेन जैसे शहरों में रहने वाले प्रवासी भारतीय आज भी अपनी पुरानी पीढ़ी के साथ बैठकर इन फिल्मों को देखना पसंद करते हैं। ऑस्ट्रेलिया में अक्सर होने वाली 'ओल्ड मेलोडीज' नाइट्स और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में उनके गानों—जैसे 'बहारों फूल बरसाओ' या 'ए फूल झड़ें'—की गूंज आज भी सुनाई देती है। नई पीढ़ी के लिए ये फिल्में अपने दादा-दादी की जड़ों को समझने का एक माध्यम हैं।
राजेंद्र कुमार की अभिनय शैली में एक खास तरह की संवेदनशीलता और गहराई थी, जो दर्शकों के दिलों को छू जाती थी। 'संगम' फिल्म में गोपाल का उनका चरित्र आज भी त्याग और दोस्ती की एक मिसाल माना जाता है। उन्होंने न केवल अभिनय में नाम कमाया, बल्कि एक निर्माता के रूप में भी 'लव स्टोरी' जैसी सफल फिल्म दी, जिसने उनके बेटे गौरव कुमार को लॉन्च किया। फिल्म उद्योग में उनके योगदान के लिए उन्हें 1969 में पद्म श्री से सम्मानित किया गया था।
आज जब हम राजेंद्र कुमार को याद करते हैं, तो हमें उस सादगी और प्रतिबद्धता की याद आती है जिसने हिंदी सिनेमा को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई। भले ही आज तकनीक और निर्माण के तरीके बदल गए हों, लेकिन जो भावनाएं राजेंद्र कुमार ने अपनी फिल्मों के जरिए परदे पर उकेरी थीं, वे आज भी प्रासंगिक हैं। ICN24 की ओर से हम इस महान कलाकार की विरासत को नमन करते हैं, जो ऑस्ट्रेलिया से भारत तक हर भारतीय के दिल में सदा जीवित रहेंगे।
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