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रथ यात्रा 2026: भगवान जगन्नाथ को क्यों अर्पित की जाती है 'बेंत'? जानें इस अनोखी परंपरा का गहरा महत्व

ICN24 Newsroom 2 जुल॰ 2026, 03:31 pm
रथ यात्रा 2026: भगवान जगन्नाथ को क्यों अर्पित की जाती है 'बेंत'? जानें इस अनोखी परंपरा का गहरा महत्व

पुरी की रथ यात्रा में 'बेंत' अर्पित करने की परंपरा का विशेष महत्व है। जानिए कैसे यह साधारण सी दिखने वाली छड़ी भगवान जगन्नाथ की शाही मर्यादा और सुरक्षा का प्रतीक मानी जाती है।

ओडिशा के पुरी में आयोजित होने वाली भगवान जगन्नाथ की विश्व प्रसिद्ध रथ यात्रा न केवल अपनी भव्यता के लिए, बल्कि सदियों पुरानी विशिष्ट परंपराओं के लिए भी जानी जाती है। साल 2026 की रथ यात्रा की तैयारियों के बीच, भक्तों और संस्कृति प्रेमियों के बीच एक विशेष अनुष्ठान चर्चा का केंद्र बना हुआ है—वह है भगवान जगन्नाथ को 'बेंत' (Beth or Benta) अर्पित करने की परंपरा। यह साधारण सी दिखने वाली छड़ी जगन्नाथ संस्कृति में गहरा आध्यात्मिक और प्रशासनिक महत्व रखती है। स्थानीय भाषा में 'बेंत' या 'बेंटा' के रूप में जानी जाने वाली यह छड़ी पारंपरिक रूप से बेंत या बांस से तैयार की जाती है। ऐतिहासिक और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह बेंत भगवान जगन्नाथ की शाही सत्ता और मर्यादा का प्रतीक है। जब भगवान अपने गर्भगृह से निकलकर रथ पर सवार होते हैं, तो यह बेंत उनके साथ होती है। इसे केवल एक वस्तु नहीं, बल्कि भगवान के रक्षक और अनुशासन के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। अनुष्ठानों के दौरान, सेवायत (पुजारी) इस बेंत का उपयोग प्रतीकात्मक रूप से भीड़ को नियंत्रित करने और भगवान के मार्ग को प्रशस्त करने के लिए करते हैं, जो यह दर्शाता है कि जगत के स्वामी की यात्रा में मर्यादा सर्वोपरि है। ऑस्ट्रेलिया में बसे भारतीय समुदाय, विशेष रूप से सिडनी, मेलबर्न और ब्रिस्बेन में रहने वाले उड़िया प्रवासियों के लिए इन सूक्ष्म परंपराओं का बहुत महत्व है। ऑस्ट्रेलिया के विभिन्न शहरों में स्थित इस्कॉन मंदिरों और सांस्कृतिक केंद्रों में जब रथ यात्रा का आयोजन होता है, तो वहां भी इन पारंपरिक तत्वों को शामिल करने का प्रयास किया जाता है। प्रवासी समुदाय के लिए यह केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि अपनी जड़ों से जुड़ने और आने वाली पीढ़ी को अपनी समृद्ध विरासत से परिचित कराने का एक जरिया है। मेलबर्न के एक सामुदायिक केंद्र के स्वयंसेवक के अनुसार, पुरी की इन छोटी लेकिन महत्वपूर्ण परंपराओं को समझना प्रवासी भारतीयों को उनकी सांस्कृतिक पहचान के और करीब लाता है। तकनीकी रूप से, इस बेंत का निर्माण एक विशेष प्रक्रिया के तहत किया जाता है। इसे पवित्र माना जाता है और रथ यात्रा से पहले इसे विशेष मंत्रों के साथ सिद्ध किया जाता है। यह परंपरा इस बात को रेखांकित करती है कि जगन्नाथ संस्कृति में हर छोटी वस्तु का अपना एक निर्धारित स्थान और दर्शन है। बेंत का उपयोग यह भी संदेश देता है कि भक्ति के मार्ग में अनुशासन और व्यवस्था अनिवार्य है। जैसे-जैसे 2026 की रथ यात्रा की तिथियां नजदीक आ रही हैं, पुरी का मंदिर प्रशासन और सेवायत इन पारंपरिक वस्तुओं को तैयार करने में जुट गए हैं। वैश्विक स्तर पर फैले जगन्नाथ भक्त इस बार भी डिजिटल माध्यमों और स्थानीय आयोजनों के जरिए इस पावन उत्सव का हिस्सा बनेंगे, जहां 'बेंत' जैसी प्राचीन परंपराएं मानवता को श्रद्धा और अनुशासन का पाठ पढ़ाती रहेंगी।
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