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मणिपुर में गहराती दरारें: भारतीय लोकतंत्र के लिए एक बड़ी चुनौती और प्रशासनिक विफलता

ICN24 Newsroom 5 जुल॰ 2026, 12:31 pm
मणिपुर में गहराती दरारें: भारतीय लोकतंत्र के लिए एक बड़ी चुनौती और प्रशासनिक विफलता

मणिपुर में जारी जातीय संघर्ष और अविश्वास की बढ़ती खाई भारतीय लोकतंत्र की एक गंभीर विफलता मानी जा रही है, जिससे ऑस्ट्रेलिया में बसे भारतीय समुदाय में भी गहरी चिंता है।

मणिपुर में जारी हिंसा और समुदायों के बीच बढ़ती नफरत की दीवारें भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में एक चिंताजनक अध्याय बन गई हैं। पिछले कई महीनों से जारी यह जातीय संघर्ष न केवल राज्य की कानून-व्यवस्था की विफलता है, बल्कि इसे स्वतंत्रता के बाद से भारतीय राजनीति की सबसे बड़ी विफलताओं में से एक माना जा रहा है। मैतेई और कुकी समुदायों के बीच अविश्वास की यह खाई इतनी गहरी हो चुकी है कि इसने राज्य के सामाजिक ताने-बाने को लगभग पूरी तरह से नष्ट कर दिया है। संघर्ष की शुरुआत भूमि विवाद और आरक्षण संबंधी मुद्दों से हुई थी, लेकिन अब यह एक ऐसी स्थिति में पहुंच गया है जिसे विशेषज्ञ 'परस्पर सुदृढ़ घृणा' (mutually reinforcing hatred) कह रहे हैं। शासन और प्रशासन द्वारा समय पर प्रभावी हस्तक्षेप न किए जाने के कारण, दोनों समुदायों के बीच संवाद के सभी रास्ते बंद हो चुके हैं। हज़ारों की संख्या में लोग विस्थापित हुए हैं और राहत शिविरों में रहने को मजबूर हैं, जो भारत जैसे उभरते वैश्विक शक्ति के लिए एक दुखद वास्तविकता है। इस संकट का प्रभाव केवल भारत की सीमाओं तक सीमित नहीं है। ऑस्ट्रेलिया में बसे विशाल भारतीय समुदाय, विशेष रूप से उत्तर-पूर्वी भारत से संबंध रखने वाले परिवारों में इसे लेकर भारी बेचैनी और चिंता है। सिडनी, मेलबर्न और ब्रिस्बेन जैसे शहरों में रहने वाले भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई नागरिक मणिपुर से आ रही खबरों पर बारीकी से नज़र रखे हुए हैं। समुदाय के नेताओं का मानना है कि इस तरह की अस्थिरता न केवल भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि को प्रभावित करती है, बल्कि प्रवासी भारतीयों के बीच भी असुरक्षा की भावना पैदा करती है। राजनीतिक विशेषज्ञों का तर्क है कि मणिपुर का संकट केवल दो समूहों के बीच की लड़ाई नहीं है, बल्कि यह इस बात का प्रमाण है कि जब लोकतांत्रिक संस्थाएं अपने नागरिकों की सुरक्षा और निष्पक्षता बनाए रखने में विफल होती हैं, तो परिणाम कितने भयावह हो सकते हैं। राज्य और केंद्र सरकारों की ओर से समाधान की दिशा में उठाए गए कदम अब तक नाकाफी साबित हुए हैं। शांति बहाली के लिए केवल सुरक्षा बलों की तैनाती पर्याप्त नहीं है; इसके लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति और दोनों समुदायों के बीच विश्वास बहाली के ठोस प्रयासों की आवश्यकता है। अंततः, मणिपुर की स्थिति एक चेतावनी है। यदि समय रहते इन 'फाल्ट लाइन्स' को भरने का प्रयास नहीं किया गया, तो यह अलगाववाद और सामाजिक विभाजन की भावना को और बल दे सकता है। ऑस्ट्रेलिया जैसे बहुसांस्कृतिक देशों में रहने वाले भारतीयों के लिए, भारत की आंतरिक शांति और एकता अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह सीधे तौर पर उनकी पहचान और उनके देश के वैश्विक सम्मान से जुड़ी हुई है।
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