राजनीति
क्या उदारवादी लोकतंत्र का स्वर्ण युग समाप्त हो गया है? लोकतांत्रिक समाजवाद पर फिर छिड़ी वैश्विक बहस
ICN24 Newsroom 10 जुल॰ 2026, 02:31 pm

फ्रांसिस फुकुयामा के 'इतिहास का अंत' सिद्धांत के विफल होने के बाद, अब दुनिया भर में लोकतांत्रिक समाजवाद और कल्याणकारी राज्य की प्रासंगिकता पर नई चर्चा शुरू हो गई है।
1990 के दशक में राजनीतिक विचारक फ्रांसिस फुकुयामा ने एक साहसिक दावा किया था कि पश्चिमी उदारवादी लोकतंत्र और कल्याणकारी पूंजीवाद मानवता के शासन का अंतिम और सर्वश्रेष्ठ स्वरूप है। उनके इस 'इतिहास के अंत' (End of History) के सिद्धांत ने दशकों तक वैश्विक राजनीति को प्रभावित किया। हालांकि, हाल के वर्षों में बढ़ती आर्थिक असमानता, जलवायु संकट और अधिनायकवादी शक्तियों के उभार ने इस धारणा को पूरी तरह से बदल दिया है। आज दुनिया एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहाँ लोकतांत्रिक समाजवाद की अवधारणा एक व्यावहारिक विकल्प के रूप में फिर से उभर रही है।
भारत और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों के लिए यह वैचारिक बदलाव विशेष महत्व रखता है। भारतीय संविधान की प्रस्तावना में 'समाजवाद' शब्द को प्रमुखता दी गई है, जो यह सुनिश्चित करता है कि विकास का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे। दूसरी ओर, ऑस्ट्रेलिया का सामाजिक ढांचा काफी हद तक लोकतांत्रिक समाजवाद के सिद्धांतों पर आधारित रहा है, जिसमें 'मेडिकेयर' (Medicare) जैसी सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाएं और मजबूत सामाजिक सुरक्षा जाल (Social Security Net) शामिल हैं। प्रवासी भारतीय समुदाय, जो अक्सर बेहतर जीवन की तलाश में ऑस्ट्रेलिया आता है, वह इन्हीं दो प्रणालियों के बीच एक अनूठा संतुलन देखता है।
दार्शनिक स्लावोज जि़ज़ेक जैसे विचारकों का तर्क है कि जिस उदारवादी पूंजीवाद को अजेय माना जा रहा था, वह अब आंतरिक विरोधाभासों से जूझ रहा है। फुकुयामा का मानना था कि दुनिया के अन्य देश अंततः इसी पश्चिमी मॉडल को अपनाएंगे, लेकिन चीन और रूस जैसे देशों के राजनीतिक विकास ने इस अनुमान को गलत साबित कर दिया है। इसके बजाय, अब चर्चा इस बात पर केंद्रित है कि कैसे लोकतांत्रिक मूल्यों को बनाए रखते हुए आर्थिक संसाधनों का अधिक न्यायसंगत वितरण किया जाए।
ऑस्ट्रेलिया में रह रहे भारतीय समुदाय के लिए यह बहस सीधे तौर पर उनके भविष्य से जुड़ी है। ऑस्ट्रेलिया में निजीकरण की बढ़ती प्रवृत्ति और जीवनयापन की लागत (Cost of Living) में वृद्धि ने यहाँ के कल्याणकारी राज्य के भविष्य पर सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि सार्वजनिक सेवाएं कमजोर होती हैं, तो इसका सीधा असर मध्यम वर्ग और प्रवासियों पर पड़ता है। ऐसे में 'लोकतांत्रिक समाजवाद' केवल एक अकादमिक शब्द नहीं रह जाता, बल्कि यह शिक्षा, स्वास्थ्य और आवास जैसे बुनियादी अधिकारों की सुरक्षा की मांग बन जाता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि आगामी दशकों में राजनीति का मुख्य केंद्र यह नहीं होगा कि लोकतंत्र बचा रहेगा या नहीं, बल्कि यह होगा कि वह लोकतंत्र कितना 'सामाजिक' होगा। क्या वह केवल कॉरपोरेट हितों की रक्षा करेगा, या फिर वह आम नागरिकों के जीवन स्तर को सुधारने की जिम्मेदारी लेगा? भारत की मिश्रित अर्थव्यवस्था का अनुभव और ऑस्ट्रेलिया की समावेशी नीतियां इस नई वैश्विक व्यवस्था को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। यह समय केवल पुरानी व्यवस्थाओं के टूटने का नहीं है, बल्कि एक अधिक मानवीय और न्यायपूर्ण व्यवस्था के निर्माण का है।
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