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गिरती जन्मदर और बदलती प्राथमिकताएं: सरकारें लुटा रही हैं अरबों, पर युवाओं को तलाश है बराबरी और भरोसे की

ICN24 Newsroom 12 जुल॰ 2026, 01:31 pm
गिरती जन्मदर और बदलती प्राथमिकताएं: सरकारें लुटा रही हैं अरबों, पर युवाओं को तलाश है बराबरी और भरोसे की

UNFPA 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया भर की युवा पीढ़ी शादी और परिवार से पहले आर्थिक स्वतंत्रता और एक भरोसेमंद साथी को प्राथमिकता दे रही है।

संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (UNFPA) की ताजा 'स्टेट ऑफ वर्ल्ड पॉपुलेशन 2026' रिपोर्ट ने दुनिया भर की सरकारों के लिए एक नई चुनौती पेश कर दी है। जहां एक तरफ विकसित और विकासशील देश अपनी गिरती जन्मदर को रोकने के लिए अरबों डॉलर के राहत पैकेजों और वित्तीय प्रोत्साहनों की घोषणा कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ वर्तमान पीढ़ी की प्राथमिकताएं पूरी तरह बदल चुकी हैं। रिपोर्ट के अनुसार, आज के युवा केवल आर्थिक मदद के लिए परिवार शुरू करने को तैयार नहीं हैं; वे एक ऐसा भरोसेमंद साथी चाहते हैं जो समानता और भावनात्मक सुरक्षा के धरातल पर उनके साथ खड़ा हो। जापान, दक्षिण कोरिया और कई यूरोपीय देशों की तर्ज पर अब ऑस्ट्रेलिया और भारत जैसे देशों में भी जन्मदर में गिरावट एक गंभीर चिंता का विषय बनती जा रही है। सरकारों ने मातृत्व अवकाश, नकद बोनस और टैक्स में छूट जैसे कई लुभावने वादे किए हैं, लेकिन आंकड़ों से पता चलता है कि इन उपायों का असर सीमित रहा है। UNFPA की रिपोर्ट संकेत देती है कि युवा पीढ़ी के लिए शादी और बच्चे अब जीवन का अनिवार्य हिस्सा नहीं रह गए हैं। वे अपनी व्यक्तिगत स्वायत्तता, करियर की स्थिरता और आर्थिक स्वतंत्रता को लेकर पहले से कहीं अधिक सजग हैं। ऑस्ट्रेलिया में बसे भारतीय समुदाय के संदर्भ में यह बदलाव और भी स्पष्ट नजर आता है। ऑस्ट्रेलिया की 'मल्टीकल्चरल' सोसाइटी में भारतीय प्रवासियों की दूसरी और तीसरी पीढ़ी अब पारंपरिक पारिवारिक ढांचे से इतर सोच रही है। सिडनी और मेलबर्न जैसे महंगे शहरों में रहने वाले भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई युवाओं के लिए 'कॉस्ट ऑफ लिविंग' (जीवन यापन की लागत) और बच्चों के पालन-पोषण का खर्च एक बड़ी बाधा है। हालांकि, आर्थिक कारणों से परे, एक बड़ा कारण 'समान भागीदारी' की कमी भी है। आधुनिक महिलाएं अब घर और बाहर की दोहरी जिम्मेदारी अकेले निभाने के बजाय एक ऐसे साथी की तलाश में हैं, जो घरेलू कामों और पालन-पोषण में बराबर का हिस्सा ले। रिपोर्ट के भावनात्मक पहलू पर गौर करें तो यह साफ होता है कि युवा 'विश्वास' की कमी से जूझ रहे हैं। वैवाहिक संबंधों में बढ़ते अलगाव और सामाजिक अस्थिरता के बीच, वे किसी भी बंधन में बंधने से पहले यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि उनका साथी मानसिक और भावनात्मक रूप से कितना परिपक्व है। शिक्षा के बढ़ते स्तर ने युवाओं की अपेक्षाओं को भी बढ़ाया है। वे अब पुराने सामाजिक दबावों के बजाय अपनी खुशी और मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता दे रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि सरकारों को अब केवल पैसा बांटने के बजाय सामाजिक ढांचे में सुधार लाने की जरूरत है। कार्यस्थल पर लचीलापन, किफायती चाइल्डकेयर और लैंगिक समानता को बढ़ावा देने वाली नीतियां ही इस संकट का वास्तविक समाधान हो सकती हैं। जब तक समाज और सरकारें युवाओं की इन बदलती भावनात्मक और सामाजिक जरूरतों को नहीं समझेंगे, तब तक केवल अरबों रुपए खर्च करके जन्मदर को बढ़ाना एक मुश्किल चुनौती बनी रहेगी। यह रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि परिवार का भविष्य अब सरकारी बजट पर नहीं, बल्कि आपसी भरोसे और बराबरी के रिश्तों पर टिका है।
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