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आधुनिक जीवन की भागदौड़ में सच्ची खुशी की तलाश: भौतिकवाद से परे रिश्तों में सुकून
ICN24 Newsroom 27 जुल॰ 2026, 01:35 pm
भागदौड़ भरी आधुनिक जीवनशैली में हम अक्सर भौतिक संसाधनों में खुशी तलाशते हैं, जबकि असली सुकून अपनों के साथ और अपने भीतर छिपा होता है।
आज के दौर में सफलता की परिभाषा केवल बैंक बैलेंस, आलीशान घर और लग्जरी कारों तक सिमट कर रह गई है। दुनिया के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने की होड़ में इंसान इतना व्यस्त हो गया है कि वह खुद को और अपने परिवार को भूलता जा रहा है। जनसत्ता के स्तंभ 'दुनिया मेरे आगे' में रितुप्रिया के विचार इसी कड़वे सच की ओर इशारा करते हैं कि जिस खुशी की तलाश में हम दर-दर भटक रहे हैं, वह असल में हमारे आसपास और हमारे अपनों के बीच ही मौजूद है।
विशेष रूप से प्रवासी भारतीय समुदाय के लिए, जो ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में एक बेहतर भविष्य की तलाश में दिन-रात संघर्ष कर रहे हैं, यह विषय अत्यंत प्रासंगिक है। सात समंदर पार एक नई पहचान बनाने की जद्दोजहद में हम अक्सर 'अकेलेपन' का शिकार हो जाते हैं। हम बड़े घरों और महंगी गाड़ियों के सपने तो पूरे कर लेते हैं, लेकिन उन घरों में गूंजने वाली हंसी कहीं खो जाती है। विशेषज्ञों का मानना है कि बाहरी चकाचौंध से मिलने वाली खुशी क्षणिक होती है, जबकि मानसिक शांति और संतोष हमें अपनों के साथ बिताए गए गुणवत्तापूर्ण समय से ही मिलता है।
भागदौड़ भरी इस जिंदगी में हमने तकनीक को अपना हमसफर बना लिया है। सोशल मीडिया पर सैकड़ों 'मित्र' होने के बावजूद, असल जिंदगी में जब हमें किसी के कंधे की जरूरत होती है, तो हम खुद को अकेला पाते हैं। रितुप्रिया के लेख का मूल भाव यही है कि हमें अपनी प्राथमिकताओं को पुनर्व्यवस्थित करने की आवश्यकता है। खुशी किसी मॉल की शेल्फ पर नहीं मिलती, बल्कि यह परिवार के साथ साझा किए गए भोजन, बच्चों की नादानियों और बुजुर्गों के अनुभवों में निहित है।
ऑस्ट्रेलिया में रह रहे भारतीय समुदाय के लिए यह और भी महत्वपूर्ण है कि वे अपनी जड़ों और रिश्तों की अहमियत को समझें। काम और निजी जीवन के बीच संतुलन (Work-Life Balance) केवल एक कॉरपोरेट शब्द नहीं होना चाहिए, बल्कि इसे जीवन का आधार बनाना चाहिए। जब हम काम के दबाव को घर की दहलीज के बाहर छोड़कर अपनों से मिलते हैं, तो वह सुकून किसी भी बोनस या प्रमोशन से बड़ा होता है।
अंततः, खुशी एक मानसिक अवस्था है। यह हमारे दृष्टिकोण पर निर्भर करती है कि हम आधा गिलास खाली देखते हैं या आधा भरा हुआ। यदि हम बाहरी दुनिया की तुलना और प्रतिस्पर्धा को छोड़कर अपने भीतर झांकें, तो पाएंगे कि छोटी-छोटी खुशियां ही जीवन को संपूर्ण बनाती हैं। अपनों का साथ और मन की शांति ही वह असली निवेश है, जिसका लाभ हमें जीवनभर मिलता रहता है। इसलिए, भागना बंद करें और ठहरकर अपनों की आंखों में वह खुशी तलाशें, जो दुनिया की किसी भी दौलत से नहीं खरीदी जा सकती।
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