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फीफा वर्ल्ड कप 2026: क्या फुटबॉल का जुनून वैश्विक असमानता की भेंट चढ़ रहा है?

ICN24 Newsroom 13 जून 2026, 08:01 pm
फीफा वर्ल्ड कप 2026: क्या फुटबॉल का जुनून वैश्विक असमानता की भेंट चढ़ रहा है?

फीफा वर्ल्ड कप 2026 के आयोजन को लेकर सवाल उठने लगे हैं। सख्त वीजा नियमों और बढ़ती लागत के कारण वैश्विक दक्षिण के देशों और प्रशंसकों के लिए यह टूर्नामेंट पहुंच से बाहर होता जा रहा है।

फुटबॉल को अक्सर 'खूबसूरत खेल' कहा जाता है क्योंकि यह दुनिया के हर कोने में खेला और पसंद किया जाता है। हालांकि, आगामी फीफा वर्ल्ड कप 2026 की तैयारियों के बीच यह सवाल खड़ा हो गया है कि क्या यह खेल अब केवल अमीर देशों की बपौती बनकर रह गया है। 2026 का वर्ल्ड कप अमेरिका, कनाडा और मैक्सिको में आयोजित होना है, लेकिन कड़े वीजा नियमों, अत्यधिक यात्रा खर्च और बुनियादी ढांचे की चुनौतियों ने वैश्विक दक्षिण (Global South) के प्रशंसकों और खिलाड़ियों के बीच गहरी निराशा पैदा कर दी है। भारत और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में बसे भारतीय समुदाय के लिए यह चिंता का विषय है। ऑस्ट्रेलिया में एक बड़ी फुटबॉल प्रेमी भारतीय आबादी रहती है, जो अक्सर अपनी राष्ट्रीय टीम और पसंदीदा वैश्विक खिलाड़ियों को देखने के लिए विदेश यात्रा करती है। लेकिन अमेरिका और कनाडा जैसे देशों के वीजा हासिल करने की लंबी प्रक्रिया और रिजेक्शन की उच्च दर ने इस बार कई प्रशंसकों के उत्साह को ठंडा कर दिया है। जानकारों का कहना है कि फीफा और मेजबान राष्ट्रों का यह रवैया फुटबॉल की सार्वभौमिकता की भावना के खिलाफ है। समीक्षकों का तर्क है कि फुटबॉल का व्यावसायीकरण और मेजबानी के सख्त मापदंड इसे एक विशिष्ट क्लब में तब्दील कर रहे हैं। उदाहरण के लिए, अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका के कई देशों के प्रशंसकों को न केवल वित्तीय बोझ उठाना पड़ता है, बल्कि उन्हें 'सुरक्षा' के नाम पर वीजा की ऐसी प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है जो अक्सर अपमानजनक होती हैं। यह स्थिति उन लोगों के लिए और भी कठिन हो जाती है जो ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में अस्थाई वीजा पर रह रहे हैं और वहां से उत्तरी अमेरिका की यात्रा करने की योजना बना रहे हैं। इसके अलावा, खिलाड़ियों के लिए भी चुनौतियां कम नहीं हैं। कम रैंकिंग वाले देशों के खिलाड़ियों को अक्सर रसद और वीजा संबंधी बाधाओं का सामना करना पड़ता है, जो उनकी मानसिक और शारीरिक तैयारी पर असर डालता है। यदि खेल का सबसे बड़ा मंच ही दुनिया की आधी आबादी के लिए दुर्गम हो जाए, तो फुटबॉल की समावेशिता पर सवाल उठना लाजिमी है। अंततः, फीफा को यह समझने की जरूरत है कि फुटबॉल का असली सौंदर्य इसके विविध प्रशंसकों में है। यदि खेल केवल आर्थिक शक्ति और पासपोर्ट की ताकत पर आधारित हो जाएगा, तो वह अपनी आत्मा खो देगा। भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई समुदाय जैसे वैश्विक प्रवासियों के लिए, जो खेलों को विभिन्न संस्कृतियों को जोड़ने वाले सेतु के रूप में देखते हैं, यह असमानता फुटबॉल के भविष्य के लिए एक चिंताजनक संकेत है।
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