राजनीति
डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी और बंगाल में हिंदू एकता का उदय: 1937 के चुनावों का ऐतिहासिक मोड़
ICN24 Newsroom 6 जुल॰ 2026, 06:31 pm

1937 के बंगाल विधानसभा चुनावों ने भारतीय राजनीति की दिशा बदल दी। जानें कैसे कांग्रेस की अनिर्णय की स्थिति ने डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के राजनीतिक उदय की नींव रखी।
वर्ष 1937 के बंगाल विधानसभा चुनाव भारतीय राजनीतिक इतिहास में एक ऐसे मोड़ के रूप में दर्ज हैं, जिसने न केवल बंगाल बल्कि पूरे भारत की नियति को प्रभावित किया। उस समय के बंगाल में राजनीतिक परिदृश्य त्रिकोणीय था, जिसमें भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, ऑल इंडिया मुस्लिम लीग और फजलुल हक की कृषक प्रजा पार्टी (KPP) प्रमुख खिलाड़ी थे। जब चुनाव के परिणाम आए, तो किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला, जिसने राज्य को एक अनिश्चितता के दौर में धकेल दिया।
कांग्रेस 54 सीटों के साथ सबसे बड़े एकल दल के रूप में उभरी थी, लेकिन उसने सरकार बनाने से इनकार कर दिया। कांग्रेस का यह निर्णय ऐतिहासिक रूप से विवादित रहा है। जानकारों का मानना है कि यदि कांग्रेस उस समय कृषक प्रजा पार्टी के साथ गठबंधन करती, तो शायद बंगाल का भविष्य कुछ और होता। कांग्रेस की इस हिचकिचाहट ने फजलुल हक को मुस्लिम लीग के साथ हाथ मिलाने पर मजबूर कर दिया, जिससे बंगाल में सांप्रदायिक राजनीति का एक नया अध्याय शुरू हुआ।
यही वह दौर था जब डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने महसूस किया कि बंगाली हिंदुओं के राजनीतिक और सांस्कृतिक हितों की रक्षा के लिए एक मजबूत आवाज की आवश्यकता है। उस समय तक मुखर्जी मुख्य रूप से एक शिक्षाविद् और कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति के रूप में जाने जाते थे। हालांकि, बदलते राजनीतिक समीकरणों और मुस्लिम लीग के बढ़ते प्रभाव ने उन्हें सक्रिय राजनीति में आने के लिए प्रेरित किया। उनके लिए यह केवल सत्ता का संघर्ष नहीं था, बल्कि एक ऐसी विचारधारा का संरक्षण था जो समावेशी और राष्ट्रवादी हो।
ऑस्ट्रेलिया में बसे भारतीय समुदाय के लिए, विशेषकर उन परिवारों के लिए जिनकी जड़ें अविभाजित बंगाल में हैं, यह इतिहास अत्यंत प्रासंगिक है। सिडनी और मेलबर्न जैसे शहरों में रहने वाले बंगाली प्रवासियों के लिए डॉ. मुखर्जी का योगदान उस विरासत का हिस्सा है, जिसने अंततः पश्चिम बंगाल के अस्तित्व को सुनिश्चित किया। 1937 के इन चुनावों ने यह स्पष्ट कर दिया था कि संगठित हुए बिना किसी भी समुदाय का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है।
मुस्लिम लीग और केपीपी के गठबंधन ने बंगाल में ऐसी नीतियां लागू करना शुरू किया, जिन्हें हिंदू समाज के एक बड़े वर्ग ने भेदभावपूर्ण माना। शिक्षा और नौकरियों में आरक्षण के नए नियमों ने मध्यम वर्ग के हिंदुओं में असुरक्षा की भावना पैदा की। इसी असुरक्षा को डॉ. मुखर्जी ने पहचाना और बिखरे हुए हिंदू समाज को एक सूत्र में पिरोने का कार्य शुरू किया। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि एकता ही वह एकमात्र रास्ता है जिससे वे अपनी पहचान और अधिकारों की रक्षा कर सकते हैं। यह लेख श्रृंखला का दूसरा भाग उस नींव का विश्लेषण करता है जिस पर बाद में बंगाल में एक बड़े आंदोलन की इमारत खड़ी हुई।
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