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सरकारी शिक्षिका की छुट्टी में देरी पर उपजा विवाद: ब्रिटेन में बसी डॉक्टर बेटी ने प्रशासनिक उदासीनता पर उठाए सवाल

ICN24 Newsroom 4 जुल॰ 2026, 04:31 pm
सरकारी शिक्षिका की छुट्टी में देरी पर उपजा विवाद: ब्रिटेन में बसी डॉक्टर बेटी ने प्रशासनिक उदासीनता पर उठाए सवाल

ब्रिटेन में रहने वाली एक कश्मीरी डॉक्टर के सोशल मीडिया पोस्ट ने जम्मू-कश्मीर के शिक्षा विभाग में फैली लालफीताशाही को उजागर किया है, जहां उनकी मां की छुट्टी महीनों से लंबित थी।

श्रीनगर और ब्रिस्टल (इंग्लैंड) के बीच उपजे एक प्रशासनिक विवाद ने जम्मू-कश्मीर के स्कूल शिक्षा विभाग (SED) की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह मामला तब चर्चा में आया जब ब्रिटेन के ब्रिस्टल में कार्यरत एक कश्मीरी मूल की महिला डॉक्टर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'X' पर अपनी व्यथा साझा की। डॉक्टर ने आरोप लगाया कि उनकी माँ, जो कश्मीर में एक सरकारी शिक्षिका हैं, अपनी पोती के जन्म और बेटी की गर्भावस्था के दौरान देखभाल के लिए ब्रिटेन नहीं आ सकीं, क्योंकि उनकी छुट्टी की फाइल महीनों तक दफ्तरों के चक्कर काटती रही। डॉक्टर मुबीना (परिवर्तित नाम) ने अपने पोस्ट में बताया कि उनकी माँ ने नियमानुसार काफी पहले 'विदेशी अवकाश' (Ex-India Leave) के लिए आवेदन किया था। इसके बावजूद, श्रीनगर स्थित स्कूल शिक्षा निदेशालय (DSEK) में उनकी फाइल को कथित तौर पर ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। डॉक्टर ने अपनी पोस्ट में विभाग की 'प्रशासनिक उदासीनता' पर कड़ा प्रहार करते हुए लिखा कि एक सरकारी कर्मचारी को अपने परिवार की महत्वपूर्ण खुशियों में शामिल होने के लिए भी दर-दर भटकना पड़ रहा है। उन्होंने प्रशासन से पूछा कि क्या एक बुजुर्ग शिक्षिका का अपनी बेटी की मदद के लिए विदेश जाना इतना जटिल होना चाहिए? यह घटना केवल एक व्यक्तिगत समस्या नहीं है, बल्कि यह उन हजारों प्रवासी भारतीयों (NRIs) और ऑस्ट्रेलियाई-भारतीयों की साझा चिंता को भी दर्शाती है, जिनके माता-पिता भारत में सरकारी सेवाओं में कार्यरत हैं। ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले भारतीय समुदाय के लिए भी यह एक संवेदनशील मुद्दा है। अक्सर मेलबर्न, सिडनी या पर्थ में रहने वाले भारतीय अपने माता-पिता को प्रसव या आपातकालीन स्थितियों में बुलाना चाहते हैं, लेकिन भारतीय नौकरशाही की जटिल प्रक्रियाएं उनके लिए बड़ी बाधा बन जाती हैं। सोशल मीडिया पर यह पोस्ट वायरल होने के बाद, कश्मीर के स्थानीय नागरिक समाज और शिक्षक संघों ने भी विभाग की आलोचना की है। आलोचकों का कहना है कि जब सरकार 'ई-गवर्नेंस' और 'डिजिटल इंडिया' की बात करती है, तब फाइलों का इस तरह महीनों तक लंबित रहना प्रशासनिक विफलता को दर्शाता है। यह भी बताया गया है कि ऐसे मामलों में अक्सर कर्मचारियों को मंजूरी पाने के लिए कार्यालयों के कई चक्कर लगाने पड़ते हैं, जो मानसिक और आर्थिक रूप से थकाने वाला होता है। हालांकि, विभाग की ओर से अभी तक इस विशिष्ट मामले पर कोई विस्तृत आधिकारिक बयान नहीं आया है, लेकिन सूत्रों का कहना है कि सोशल मीडिया पर मामला तूल पकड़ने के बाद फाइल की जांच तेज कर दी गई है। यह मामला एक बार फिर याद दिलाता है कि विदेशों में बसे भारतीयों के लिए उनके गृह राज्य का प्रशासनिक तंत्र कितना महत्वपूर्ण है और वहां होने वाली देरी का प्रभाव सात समंदर पार बैठे परिवारों पर किस तरह पड़ता है। ICN24 इस मामले पर अपनी नजर बनाए हुए है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि प्रवासी परिवारों को भविष्य में ऐसी कठिनाइयों का सामना न करना पड़े।
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