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संभल का कल्कि तीर्थ: मोक्ष और पाप मुक्ति के प्रतीक पाँच पौराणिक कूपों का आध्यात्मिक महत्व
ICN24 Newsroom 4 जुल॰ 2026, 02:31 pm

संभल के कल्कि तीर्थ में स्थित पाँच प्राचीन कूपों से जुड़ी मोक्ष और पितृ दोष शांति की मान्यताओं ने दुनिया भर के श्रद्धालुओं को आकर्षित किया है।
उत्तर प्रदेश के ऐतिहासिक जिले संभल में स्थित कल्कि तीर्थ क्षेत्र इन दिनों धार्मिक और सांस्कृतिक चर्चाओं का केंद्र बना हुआ है। भगवान विष्णु के दसवें अवतार, निष्कलंक भगवान कल्कि की जन्मस्थली के रूप में विख्यात यह क्षेत्र न केवल भविष्य की आस्था से जुड़ा है, बल्कि अपने प्राचीन वैभव को भी संजोए हुए है। यहाँ स्थित पाँच पवित्र कूप—मृत्यु कूप, चतुर्मुख कूप, ब्रह्म कूप, ऋषिकेश कूप और पराश्रेश्वर कूप—सनातन धर्म के अनुयायियों के लिए गहरी आध्यात्मिक महत्ता रखते हैं।
इन कूपों को केवल जल का स्रोत नहीं, बल्कि दिव्य ऊर्जा का केंद्र माना जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, मृत्यु कूप का विशेष महत्व है। कहा जाता है कि इस कूप के दर्शन और इसके जल के स्पर्श से मनुष्य को जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति मिलती है। वहीं, चतुर्मुख कूप को लेकर यह मान्यता है कि यहाँ विधि-विधान से पूजा करने पर पितृ दोष से शांति मिलती है। भारतीय समुदाय, विशेष रूप से वे जो विदेशों में रह रहे हैं, अपनी जड़ों और पितरों के सम्मान के लिए इन स्थलों के प्रति विशेष श्रद्धा रखते हैं।
ब्रह्म कूप और ऋषिकेश कूप का संबंध ज्ञान और शारीरिक शुद्धि से जोड़ा गया है। स्थानीय विद्वानों का कहना है कि इन कूपों का इतिहास सतयुग से लेकर कलयुग तक की कथाओं को समेटे हुए है। पराश्रेश्वर कूप के बारे में जनश्रुति है कि यहाँ सच्चे मन से की गई प्रार्थना मनोकामनाओं की पूर्ति करती है। संभल का यह तीर्थ क्षेत्र अब केवल स्थानीय पर्यटन तक सीमित नहीं रह गया है। हाल के वर्षों में, भारत सरकार द्वारा धार्मिक पर्यटन को दिए जा रहे बढ़ावा और कल्कि धाम के निर्माण की घोषणा ने इसे वैश्विक मानचित्र पर ला खड़ा किया है।
ऑस्ट्रेलिया में रह रहे भारतीय समुदाय के लिए भी इस प्रकार के ऐतिहासिक और आध्यात्मिक स्थलों का महत्व बढ़ रहा है। सिडनी, मेलबर्न और ब्रिस्बेन जैसे शहरों में रहने वाले प्रवासी भारतीय अब अपनी सांस्कृतिक यात्राओं के दौरान संभल जैसे प्राचीन केंद्रों को अपनी सूची में शामिल कर रहे हैं। यह न केवल उनकी आस्था का प्रश्न है, बल्कि अपनी आने वाली पीढ़ियों को भारत की समृद्ध विरासत से परिचित कराने का एक जरिया भी है।
प्रशासन और स्थानीय निकायों द्वारा इन कूपों के संरक्षण और जीर्णोद्धार के कार्य तेज कर दिए गए हैं। तीर्थ क्षेत्र के आसपास बुनियादी ढांचे के विकास से उम्मीद जताई जा रही है कि आने वाले समय में यहाँ आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या में भारी वृद्धि होगी। संभल के ये पाँच कूप न केवल आस्था के प्रतीक हैं, बल्कि वे भारत की उस गौरवशाली परंपरा को भी दर्शाते हैं जहाँ प्रकृति और आध्यात्मिकता का संगम होता है।
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