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Birsa Munda Punyatithi: भगवान की तरह क्यों पूजे जाते हैं बिरसा मुंडा, कैसे बने आदिवासी समाज के नायक

ICN24 Newsroom 9 जून 2026, 03:00 pm
Birsa Munda Punyatithi: भगवान की तरह क्यों पूजे जाते हैं बिरसा मुंडा, कैसे बने आदिवासी समाज के नायक

बिरसा मुंडा की पुण्यतिथि पर जानें कैसे मात्र 25 वर्ष की आयु में उन्होंने जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए अंग्रेजों की नींव हिला दी।

भारत के स्वतंत्रता संग्राम में कई ऐसे जननायक हुए जिन्होंने न केवल औपनिवेशिक शासन को चुनौती दी, बल्कि समाज की कुरीतियों के खिलाफ भी बिगुल फूंका। भगवान बिरसा मुंडा ऐसे ही एक महान क्रांतिकारी थे, जिनकी आज पुण्यतिथि है। 9 जून 1900 को रांची जेल में मात्र 25 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया था। आदिवासी समाज आज भी उन्हें 'धरती आबा' यानी जगत पिता के रूप में पूजता है। बिरसा मुंडा का जन्म 15 नवंबर 1875 को बंगाल प्रेसिडेंसी (वर्तमान झारखंड) के रांची जिले के उलिहातू गांव में हुआ था। गरीबी में पले-बढ़े बिरसा को बचपन से ही संगीत और बांसुरी का शौक था। शुरुआती शिक्षा के दौरान उनका संपर्क ईसाई मिशनरियों से हुआ, लेकिन जल्द ही उन्हें आभास हो गया कि अंग्रेज और मिशनरी आदिवासी संस्कृति और उनकी जमीन को नुकसान पहुंचा रहे हैं। उन्होंने आदिवासियों को अपनी जड़ों की ओर लौटने और अंधविश्वास त्यागने के लिए प्रेरित किया। 19वीं सदी के अंत में, जब ब्रिटिश सरकार ने 'इंडियन फॉरेस्ट एक्ट' के जरिए आदिवासियों के पारंपरिक जल, जंगल और जमीन के अधिकारों को छीनना शुरू किया, तब बिरसा मुंडा ने 'उलगुलान' (महान विद्रोह) का आह्वान किया। उन्होंने नारा दिया— 'अबुआ राज एते जाना, महारानी राज टंडू जाना' (रानी का राज खत्म हो और हमारा राज स्थापित हो)। उनके नेतृत्व में हजारों मुंडा आदिवासियों ने तीर-कमान लेकर अंग्रेजी बंदूकों का मुकाबला किया। अंग्रेज सरकार बिरसा की बढ़ती लोकप्रियता से इस कदर डरी हुई थी कि उन पर 500 रुपये का इनाम घोषित किया गया। 3 फरवरी 1900 को उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और संदिग्ध परिस्थितियों में जेल में ही उनकी मृत्यु हो गई। आधिकारिक तौर पर मौत का कारण हैजा बताया गया, लेकिन जनश्रुतियों के अनुसार उन्हें धीमा जहर दिया गया था। उनकी शहादत व्यर्थ नहीं गई; उनके संघर्ष के कारण ही 1908 में छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम (CNT Act) पारित हुआ, जिसने आदिवासी भूमि की सुरक्षा सुनिश्चित की। आज जब भारतीय समुदाय दुनिया भर में फैला है, बिरसा मुंडा का संघर्ष आत्मसम्मान और पहचान की रक्षा का प्रतीक है। ऑस्ट्रेलिया में रह रहे प्रवासी भारतीयों के लिए भी बिरसा मुंडा का जीवन अपनी जड़ों से जुड़े रहने और अन्याय के खिलाफ खड़े होने की प्रेरणा देता है। भारत सरकार द्वारा उनके जन्मदिवस को 'जनजातीय गौरव दिवस' के रूप में मनाना उनकी ऐतिहासिक विरासत को सच्ची श्रद्धांजलि है।
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