ऑस्ट्रेलिया
अंटार्कटिका में ऑस्ट्रेलियाई टीम का ‘असाधारण’ बचाव अभियान: -43 डिग्री तापमान में बचाई गई जान
ICN24 Newsroom 7 अग॰ 2026, 07:37 am
ऑस्ट्रेलियाई अंटार्कटिक डिवीजन ने कड़ाके की ठंड और बेहद चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों के बीच केसी रिसर्च स्टेशन से एक बीमार सदस्य को सफलतापूर्वक सुरक्षित निकाल लिया है।
अंटार्कटिका के बर्फीले महाद्वीप पर जब शीतकालीन सर्दियां अपने चरम पर होती हैं, तब वहां पहुंचना लगभग असंभव माना जाता है। लेकिन हाल ही में ऑस्ट्रेलियाई बचाव दल ने एक ऐसी उपलब्धि हासिल की है जिसे विशेषज्ञ 'असाधारण' करार दे रहे हैं। ऑस्ट्रेलियाई अंटार्कटिक डिवीजन (AAD) ने शून्य से 43 डिग्री सेल्सियस नीचे के जानलेवा तापमान में एक बीमार अभियान सदस्य (expeditioner) को सफलतापूर्वक वहां से निकाल लिया है। यह बचाव अभियान केसी रिसर्च स्टेशन पर एक 'तत्काल सहायता अनुरोध' मिलने के बाद शुरू किया गया था।
इस बचाव अभियान की सबसे बड़ी चुनौती अंटार्कटिका का मौजूदा मौसम था। दक्षिणी गोलार्ध में सर्दी के महीनों के दौरान, अंटार्कटिका लगभग पूरी तरह से दुनिया से कट जाता है। समुद्री बर्फ की मोटी चादरें और भयंकर बर्फीले तूफान विमानों और जहाजों के लिए रास्ते बंद कर देते हैं। ऐसे में ऑस्ट्रेलिया के अत्याधुनिक बर्फ तोड़ने वाले जहाज (Icebreaker), आरएसवी नुयिना (RSV Nuyina) को इस मिशन पर लगाया गया। तस्मानिया के होबार्ट से रवाना हुए इस जहाज ने हजारों किलोमीटर का सफर तय किया ताकि केसी स्टेशन के करीब पहुंचकर बचाव कार्यों को अंजाम दिया जा सके।
मिशन की संवेदनशीलता को देखते हुए, दो हेलीकॉप्टरों का भी उपयोग किया गया। जब नुयिना जहाज स्टेशन के काफी करीब पहुंच गया, तो इन हेलीकॉप्टरों ने उड़ान भरी और बीमार सदस्य को जहाज तक सुरक्षित पहुंचाया। एएडी के प्रवक्ता ने बताया कि अभियान के दौरान सुरक्षा सर्वोपरि थी, क्योंकि इस मौसम में मामूली सी गलती भी घातक साबित हो सकती थी। वर्तमान में उस व्यक्ति को जहाज पर ही चिकित्सा उपचार दिया जा रहा है और उसकी स्थिति स्थिर बताई गई है।
भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई समुदाय के लिए यह खबर विशेष गर्व और रुचि का विषय है। ऑस्ट्रेलिया और भारत दोनों ही अंटार्कटिका में अपनी महत्वपूर्ण उपस्थिति रखते हैं। भारत के पास 'मैत्री' और 'भारती' जैसे अनुसंधान केंद्र हैं, और ऑस्ट्रेलिया की लॉजिस्टिक क्षमताएं अक्सर अंतरराष्ट्रीय सहयोग का केंद्र बनती हैं। अंटार्कटिका में काम करने वाले कई वैज्ञानिक और तकनीकी विशेषज्ञ भारतीय मूल के भी हैं, जो ऑस्ट्रेलिया के इन प्रतिष्ठित संस्थानों का हिस्सा हैं। ऐसे कठिन बचाव अभियानों की सफलता न केवल ऑस्ट्रेलियाई इंजीनियरिंग की ताकत को दर्शाती है, बल्कि ध्रुवीय क्षेत्रों में काम करने वाले सभी कर्मियों के लिए एक सुरक्षा कवच का भरोसा भी दिलाती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह ऑपरेशन भविष्य के शीतकालीन बचावों के लिए एक बेंचमार्क स्थापित करता है। आरएसवी नुयिना को इसी तरह की आपात स्थितियों और जटिल वैज्ञानिक मिशनों के लिए डिजाइन किया गया था। इस सफल रेस्क्यू ने साबित कर दिया है कि आधुनिक तकनीक और प्रशिक्षित पेशेवरों के दम पर दुनिया के सबसे दुर्गम कोनों से भी जान बचाई जा सकती है। फिलहाल, बचाव दल अब होबार्ट की ओर वापसी कर रहा है, जहां मरीज को आगे के उपचार के लिए अस्पताल में भर्ती कराया जाएगा।
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