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भारत का दल-बदल विरोधी कानून: ‘आया राम, गया राम’ की राजनीति पर लगाम और लोकतांत्रिक स्थिरता

ICN24 Newsroom 12 जून 2026, 02:31 pm
भारत का दल-बदल विरोधी कानून: ‘आया राम, गया राम’ की राजनीति पर लगाम और लोकतांत्रिक स्थिरता

भारत में राजनीतिक अस्थिरता को रोकने के लिए 1985 में लाया गया दल-बदल विरोधी कानून आज भी चर्चा का विषय है, जो विधायकों की खरीद-फरोख्त पर रोक लगाता है।

भारत की लोकतांत्रिक यात्रा में 'आया राम, गया राम' का मुहावरा राजनीतिक अवसरवाद और बार-बार पाला बदलने की प्रवृत्ति का प्रतीक रहा है। 1960 के दशक में हरियाणा के एक विधायक द्वारा एक ही दिन में तीन बार पार्टी बदलने के बाद शुरू हुआ यह सिलसिला भारतीय राजनीति के लिए एक गंभीर चुनौती बन गया था। इस अस्थिरता को समाप्त करने और निर्वाचित प्रतिनिधियों की निष्ठा सुनिश्चित करने के लिए 1985 में संविधान में 52वां संशोधन किया गया, जिसे 'दल-बदल विरोधी कानून' के रूप में जाना जाता है। इस कानून का मुख्य उद्देश्य उन जनप्रतिनिधियों को अयोग्य घोषित करना है जो स्वेच्छा से अपनी पार्टी छोड़ते हैं या सदन में पार्टी के निर्देशों (व्हिप) का उल्लंघन करते हैं। संविधान की 10वीं अनुसूची के तहत शामिल यह प्रावधान यह सुनिश्चित करता है कि जनता का मत व्यक्तिगत लाभ के लिए सौदा न बन जाए। हालांकि, कानून में यह भी प्रावधान है कि यदि किसी दल के दो-तिहाई सदस्य एक साथ किसी अन्य दल में विलय करते हैं, तो उन्हें अयोग्य नहीं ठहराया जाएगा। ऑस्ट्रेलिया में बसे भारतीय समुदाय के लिए भारत की यह राजनीतिक संरचना विशेष महत्व रखती है। जहां ऑस्ट्रेलिया की संसदीय प्रणाली में पार्टी से अलग राय रखने पर उतनी कड़ी पाबंदी नहीं है, वहीं भारत में दल-बदल विरोधी कानून संसदीय स्थिरता बनाए रखने के लिए अनिवार्य माना जाता है। प्रवासी भारतीयों के बीच अक्सर इस बात पर चर्चा होती है कि कैसे यह कानून गठबंधन सरकारों के दौर में 'हॉर्स-ट्रेडिंग' या विधायकों की खरीद-फरोख्त को रोकने में सहायक सिद्ध हुआ है। विशेषज्ञों का मानना है कि हालांकि इस कानून ने सरकार गिरने की घटनाओं को कम किया है, लेकिन इसने व्यक्तिगत विधायकों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को भी सीमित कर दिया है। सदन में वे अपनी अंतरात्मा की आवाज के बजाय पार्टी लाइन पर चलने के लिए मजबूर होते हैं। हाल के वर्षों में महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे राज्यों में हुए सत्ता परिवर्तन ने इस कानून की प्रभावशीलता और विधानसभा अध्यक्ष (स्पीकर) की शक्तियों पर नए सिरे से बहस छेड़ दी है। निष्कर्षतः, दल-बदल विरोधी कानून भारतीय लोकतंत्र को परिपक्व बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम रहा है। 'आया राम, गया राम' की संस्कृति को खत्म करने के लिए बना यह कानून आज भी भारतीय राजनीति की नैतिकता और स्थिरता की रक्षा कर रहा है, जो दुनिया भर में फैले भारतीय प्रवासियों के लिए एक अध्ययन का विषय है।
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