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क्या डेकेयर चुनकर मैं अपने बच्चे के साथ अन्याय कर रही हूँ? वर्किंग मदर्स के लिए बाल रोग विशेषज्ञ की सलाह
ICN24 Newsroom 13 जून 2026, 10:01 pm

भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई समुदाय की कामकाजी माताओं के बीच डेकेयर को लेकर अपराधबोध (गुिल्ट) आम है। डॉ. सैयद मुजाहिद हुसैन बता रहे हैं कि क्यों डेकेयर चुनना बच्चे की परवरिश में विफलता नहीं है।
पेरेंटहुड यानी माता-पिता बनने का सफर जीवन को पूरी तरह बदल देता है। यह हमारी दिनचर्या, प्राथमिकताओं और रिश्तों को एक नया मोड़ देता है। विशेष रूप से ऑस्ट्रेलिया में रह रहे भारतीय मूल के कामकाजी परिवारों के लिए, करियर और बच्चों की देखभाल के बीच संतुलन बनाना एक बड़ी चुनौती होती है। इस संतुलन के साथ अक्सर एक अनचाहा मेहमान भी आता है— 'गिल्ट' या अपराधबोध। क्या मैं अपने बच्चे को पर्याप्त समय दे रही हूँ? क्या डेकेयर भेजना मेरी विफलता है? ये सवाल कई माताओं को परेशान करते हैं।
प्रसिद्ध बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. सैयद मुजाहिद हुसैन (MBBS, DNB) के अनुसार, अब इन आशंकाओं पर दोबारा विचार करने का समय आ गया है। डॉ. हुसैन अपने क्लिनिक में आने वाले कई ऐसे जोड़ों का जिक्र करते हैं जो इस द्वंद्व से जूझ रहे होते हैं। वे बताते हैं कि हाल ही में एक पेशेवर दंपत्ति अपनी ढाई साल की बेटी को लेकर उनके पास आए। बच्ची को डेकेयर भेजा जा रहा था, लेकिन माँ इस बात से गहरी चिंता में थी कि वह एक माँ के तौर पर विफल हो रही है। बच्चे को होने वाली छोटी-मोटी सर्दी-खांसी ने उनके इस डर को और बढ़ा दिया था।
डॉ. हुसैन कहते हैं, "कई माताओं को लगता है कि बच्चे को खुद से दूर भेजकर उन्होंने कुछ गलत किया है। लेकिन असलियत यह नहीं है।" ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में, जहाँ भारतीय प्रवासियों के पास अक्सर दादा-दादी या संयुक्त परिवार का सपोर्ट सिस्टम उपलब्ध नहीं होता, वहां डेकेयर एक अनिवार्य और व्यावहारिक जरूरत बन जाता है।
डेकेयर को लेकर सबसे बड़ा डर बच्चों के बीमार पड़ने का होता है। समूह में रहने के कारण बच्चों को कीटाणुओं का सामना करना पड़ता है, जिससे शुरुआती सालों में संक्रमण हो सकता है। डॉ. हुसैन इसे बच्चे के विकास का एक सामान्य हिस्सा मानते हैं। उनका तर्क है कि जिस तरह बच्चा चलने की प्रक्रिया में कई बार गिरता है, उसी तरह उसका इम्यून सिस्टम (रोग प्रतिरोधक क्षमता) भी संक्रमणों का सामना करके ही मजबूत होता है। चाहे बच्चा डेकेयर जाए या घर पर रहे, शुरुआती वर्षों में बीमारियों का सामना करना स्वाभाविक है।
विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चे की परवरिश केवल माँ की जिम्मेदारी नहीं है। यह एक साझा यात्रा है। जब माता-पिता दोनों जिम्मेदारियों को बराबर बांटते हैं, तो बच्चों को अधिक स्वस्थ और संतुलित वातावरण मिलता है। डॉ. हुसैन का संदेश स्पष्ट है: माता-पिता को अपने सपनों और करियर को छोड़ने की जरूरत नहीं है।
अंततः, बच्चे केवल उस समय से नहीं सीखते जो माता-पिता उनके साथ बिताते हैं, बल्कि वे उन्हें आगे बढ़ते, मेहनत करते और सफल होते देख भी बहुत कुछ सीखते हैं। डेकेयर चुनना उपेक्षा का संकेत नहीं, बल्कि एक प्रगतिशील परिवार का व्यावहारिक निर्णय है। भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई समुदाय की माताओं के लिए यह जरूरी है कि वे इस अनावश्यक बोझ को उतारें और अपने पेशेवर व व्यक्तिगत जीवन का आनंद लें।
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