राजनीति
ज़ुलु कहावत का गहरा संदेश: 'गरीब की बात अंत में सुनी जाती है' - समावेशी समाज की ओर एक बड़ा सबक
ICN24 Newsroom 11 जुल॰ 2026, 10:31 pm
प्राचीन ज़ुलु कहावत 'एलेम्पोफाना लिवुनवा मुवा' हमें याद दिलाती है कि समाज में अक्सर सबसे कमजोर आवाजों को अनसुना कर दिया जाता है, जबकि असली समझ धन में नहीं बल्कि अनुभव में होती है।
दक्षिण अफ्रीका की प्राचीन ज़ुलु संस्कृति से निकली एक कहावत आज के आधुनिक समाज, विशेषकर ऑस्ट्रेलिया जैसे बहुसांस्कृतिक देशों में रह रहे भारतीय समुदाय के लिए बहुत प्रासंगिक है। कहावत है— 'एलेम्पोफाना लिवुनवा मुवा' (Elempofana livunwa muva), जिसका शाब्दिक अर्थ है, 'गरीब व्यक्ति की बात को सबसे अंत में ही अनुमति दी जाती है।' यह केवल शब्दों का समूह नहीं है, बल्कि उस सामाजिक कड़वी सच्चाई का प्रतिबिंब है जहाँ व्यक्ति की बातों का मूल्य उसके चरित्र या ज्ञान से नहीं, बल्कि उसकी आर्थिक स्थिति और सामाजिक रसूख से आंका जाता है।
राजनीति और समाजशास्त्र के नजरिए से देखें तो यह कहावत उस 'सिस्टेमिक बायस' या प्रणालीगत पूर्वाग्रह की ओर इशारा करती है जो दुनिया भर के लोकतंत्रों में मौजूद है। ऑस्ट्रेलिया में बसे भारतीय समुदाय के लिए यह संदेश और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। यहाँ कई नए प्रवासी (migrants) अपनी यात्रा की शुरुआत शून्य से करते हैं। अक्सर देखा गया है कि नीति-निर्माण की प्रक्रियाओं या सामुदायिक चर्चाओं में उन लोगों की आवाजें दब जाती हैं जो अभी आर्थिक रूप से संघर्ष कर रहे हैं या जो 'ब्लू-कॉलर' नौकरियों में लगे हैं। ज़ुलु ज्ञान हमें सिखाता है कि एक मजबूत समाज वह नहीं है जहाँ केवल धनी और शक्तिशाली की सुनी जाए, बल्कि वह है जहाँ समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति की राय को भी उतना ही महत्व मिले।
इतिहास गवाह है कि सबसे क्रांतिकारी और व्यावहारिक विचार अक्सर उन लोगों से आते हैं जिन्होंने जीवन की कठिनाइयों को करीब से देखा है। जब हम किसी व्यक्ति की आर्थिक स्थिति के आधार पर उसके विचारों को खारिज कर देते हैं, तो हम सामूहिक रूप से एक बेहतर निर्णय लेने का अवसर खो देते हैं। ऑस्ट्रेलिया के 'फेयर गो' (Fair Go) के सिद्धांत को सही मायने में तभी चरितार्थ किया जा सकता है जब हम अपनी सामुदायिक बैठकों, कार्यस्थलों और राजनीतिक विमर्श में इस ज़ुलु बुद्धिमत्ता को स्थान दें।
भारतीय दर्शन में भी इसी तरह की सीख मिलती है, जहाँ सादा जीवन और उच्च विचार को महत्व दिया गया है। ज़ुलु समाज की यह सीख हमें याद दिलाती है कि बौद्धिक संपदा किसी की जागीर नहीं है। एक छात्र, एक टैक्सी ड्राइवर या एक सफाई कर्मचारी के पास भी वे समाधान हो सकते हैं जो एक कॉर्पोरेट विशेषज्ञ के पास नहीं होते। समावेशिता का अर्थ केवल साथ बैठना नहीं है, बल्कि हर सदस्य की बात को ध्यान से सुनना और उसे सम्मान देना है।
अंततः, 'एलेम्पोफाना लिवुनवा मुवा' हमें आत्म-मंथन के लिए प्रेरित करती है। क्या हम अपने समुदायों में केवल सफल और समृद्ध लोगों को ही मंच प्रदान कर रहे हैं? यदि हाँ, तो हम एक अधूरे समाज का निर्माण कर रहे हैं। सच्चा विकास तभी संभव है जब हम आर्थिक बाधाओं को तोड़कर ज्ञान और अनुभव का सम्मान करना सीखेंगे। इस प्राचीन अफ़्रीकी ज्ञान को अपनाकर ही हम ऑस्ट्रेलिया में एक अधिक न्यायसंगत और मजबूत भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई समुदाय की नींव रख सकते हैं।
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