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किताब के पन्ने अब 'डूम-स्क्रॉलिंग' क्यों लगने लगे हैं? आधुनिक पाठकों की बदलती आदतों का विश्लेषण
ICN24 Newsroom 9 जून 2026, 09:31 pm
डिजिटल युग में एकाग्रता की कमी के कारण अब किताबें पढ़ना भी एक चुनौती बन गया है। जानिए कैसे स्क्रीन की लत हमारी पढ़ने की क्षमता को प्रभावित कर रही है।
आज के डिजिटल युग में, जहाँ सूचनाओं की बौछार निरंतर होती रहती है, पढ़ने की हमारी पारंपरिक आदतें एक गहरे संकट से गुजर रही हैं। ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले भारतीय समुदाय सहित दुनिया भर के पाठकों ने महसूस किया है कि जो किताबें कभी सुकून का जरिया हुआ करती थीं, उन्हें पढ़ना अब एक मानसिक बोझ या 'डूम-स्क्रॉलिंग' जैसा लगने लगा है। यह बदलाव केवल समय की कमी के कारण नहीं, बल्कि हमारी एकाग्रता के बुनियादी ढांचे में आए बदलाव के कारण है।
मनोवैज्ञानिकों और भाषा विशेषज्ञों का मानना है कि 'रेस्टलेस अटेंशन' यानी बेचैन ध्यान अब एक वैश्विक समस्या बन चुका है। जब हम किसी भौतिक पुस्तक का पन्ना पलटते हैं, तो हमारा मस्तिष्क उस गहरी शांति और एकाग्रता की तलाश करता है जिसे 'डीप रीडिंग' कहा जाता है। हालांकि, स्मार्टफोन और सोशल मीडिया के अभ्यस्त हो चुके हमारे दिमाग को अब हर कुछ सेकंड में 'डोपामाइन' की खुराक चाहिए होती है। यही कारण है कि एक गंभीर लेख या उपन्यास पढ़ते समय भी हमारा मन बार-बार नोटिफिकेशन चेक करने या स्क्रीन की ओर भागने के लिए व्याकुल रहता है।
भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई प्रवासियों के लिए यह चुनौती और भी जटिल है। काम के दबाव, परिवार से दूरी और सूचनाओं के लिए लगातार व्हाट्सएप या फेसबुक पर निर्भरता ने पढ़ने के धैर्य को कम कर दिया है। कई पाठकों का कहना है कि वे किताब तो उठा लेते हैं, लेकिन कुछ ही पन्नों के बाद उन्हें लगने लगता है कि वे पिछड़ रहे हैं या उन्हें कुछ 'सार्थक' (Productive) करना चाहिए। इसे विशेषज्ञ 'कम्प्लीशन ट्रैप' कहते हैं, जहाँ पढ़ने का आनंद लेने के बजाय उसे केवल खत्म करने का एक लक्ष्य मान लिया जाता है।
पुराने समय में किताबें पढ़ना एक धीमी और इत्मीनान वाली प्रक्रिया थी। हर पन्ने पर रुकना, सोचना और पात्रों के साथ जीना एक कला थी। आज, वही प्रक्रिया हमें समय की बर्बादी लगने लगी है। हम सूचनाओं को केवल 'स्कैन' करने के आदी हो चुके हैं, न कि उन्हें आत्मसात करने के। यह डिजिटल संस्कृति का वह दुष्प्रभाव है जो हमारी कल्पनाशीलता को सीमित कर रहा है।
विशेषज्ञों का सुझाव है कि इस स्थिति से उबरने के लिए हमें 'डिजिटल डिटॉक्स' और सचेत पठन (Mindful Reading) की आवश्यकता है। घर की अलमारियों पर रखी किताबें अब भी उसी धैर्य के साथ हमारा इंतजार कर रही हैं। यदि हम दिन में केवल 20 मिनट बिना फोन के पढ़ने का संकल्प लें, तो हम उस खोए हुए सुकून को वापस पा सकते हैं। यह केवल एक शौक नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य के लिए एक अनिवार्य व्यायाम है।
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