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$700 मिलियन खर्च करने के बाद खाली पड़े अप्रवासी केंद्रों को बेचने की तैयारी में अमेरिकी एजेंसी ICE

ICN24 Newsroom 20 जून 2026, 09:22 am
$700 मिलियन खर्च करने के बाद खाली पड़े अप्रवासी केंद्रों को बेचने की तैयारी में अमेरिकी एजेंसी ICE

अमेरिकी अप्रवासन और सीमा शुल्क प्रवर्तन (ICE) उन केंद्रों को बेचने या छोड़ने की योजना बना रहा है जिन पर $700 मिलियन खर्च किए गए थे, लेकिन वे कभी शुरू नहीं हुए।

वाशिंगटन: अमेरिकी अप्रवासन और सीमा शुल्क प्रवर्तन (ICE) विभाग एक बड़े वित्तीय विवाद के केंद्र में है। हालिया रिपोर्टों के अनुसार, एजेंसी उन विशाल गोदामों और केंद्रों को बेचने या छोड़ने की कोशिश कर रही है, जिन्हें अप्रवासियों को रखने के लिए अधिग्रहित किया गया था। चौंकाने वाली बात यह है कि इन केंद्रों पर लगभग 700 मिलियन डॉलर (भारतीय मुद्रा में करीब 5,800 करोड़ रुपये) खर्च करने के बावजूद, इनमें से कई केंद्र कभी क्रियान्वित ही नहीं हो सके। यह मामला सरकारी धन के दुरुपयोग और अप्रवासन नीति के कुप्रबंधन का एक ज्वलंत उदाहरण बनकर उभरा है। रिपोर्ट बताती है कि पिछले कुछ वर्षों में, अमेरिकी सरकार ने अप्रवासियों की संख्या में संभावित वृद्धि को देखते हुए कई बड़े गोदामों को हिरासत केंद्रों (detention centers) में बदलने के लिए निवेश किया था। हालांकि, बुनियादी ढांचे की कमी, कानूनी अड़चनों और नीतिगत बदलावों के कारण ये सुविधाएं केवल सफेद हाथी बनकर रह गईं। भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई समुदाय के लिए यह खबर वैश्विक स्तर पर अप्रवासन प्रबंधन की जटिलताओं को समझने के लिहाज से महत्वपूर्ण है। ऑस्ट्रेलिया में भी 'ऑफशोर प्रोसेसिंग' और डिटेंशन सेंटरों पर होने वाले भारी खर्च पर अक्सर बहस होती रही है। जिस तरह अमेरिका में करदाताओं का पैसा बिना किसी उपयोग के खर्च हुआ, वैसी ही चिंताएं ऑस्ट्रेलिया के क्रिसमस आइलैंड और नौरू जैसे केंद्रों को लेकर भी जताई जाती रही हैं। भारतीय मूल के लोग, जो दुनिया भर में सबसे बड़े प्रवासी समूहों में से एक हैं, अक्सर इन नीतियों से सीधे या परोक्ष रूप से प्रभावित होते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इन अप्रयुक्त केंद्रों का रखरखाव एजेंसी के बजट पर भारी बोझ डाल रहा है। ICE अब इन संपत्तियों को वापस निजी मालिकों को सौंपने या उन्हें बाजार में बेचने की प्रक्रिया शुरू कर चुका है। इस कदम का उद्देश्य उस वित्तीय घाटे को कम करना है जो इन खाली पड़े ढांचे की वजह से हो रहा है। नागरिक अधिकार समूहों ने इस स्थिति की आलोचना करते हुए कहा है कि इस धन का उपयोग अप्रवासन प्रणाली को मानवीय बनाने या कानूनी प्रक्रियाओं को तेज करने के लिए किया जा सकता था। फिलहाल, अमेरिका में जो बाइडन प्रशासन को रिपब्लिकन और डेमोक्रेट दोनों पक्षों से दबाव का सामना करना पड़ रहा है। जहां एक पक्ष इसे प्रशासनिक विफलता मान रहा है, वहीं दूसरा पक्ष इसे भविष्य की जरूरतों के लिए की गई तैयारी का हिस्सा बता रहा है। भारत जैसे देशों से अमेरिका जाने वाले छात्रों और पेशेवरों के लिए भी यह अनिश्चितता वाली स्थिति चिंता का विषय है, क्योंकि यह सीधे तौर पर वहां की अप्रवासन मशीनरी की कार्यक्षमता को दर्शाता है।
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