राजनीति
यूपी चुनाव 2027: क्या मायावती, चंद्रशेखर और ओवैसी बनाएंगे नया मोर्चा? उत्तर प्रदेश में सियासी हलचल तेज
ICN24 Newsroom 15 जून 2026, 05:31 pm

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक समीकरण बदलने के संकेत मिल रहे हैं। मायावती, चंद्रशेखर आजाद और असदुद्दीन ओवैसी के बीच संभावित गठबंधन को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं।
लखनऊ: उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनावों के लिए अभी समय शेष है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में बिसात बिछनी शुरू हो गई है। राज्य की राजनीति में एक बार फिर 'तीसरे मोर्चे' की आहट सुनाई दे रही है। चर्चाओं का केंद्र बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की प्रमुख मायावती, आजाद समाज पार्टी के नेता चंद्रशेखर आजाद और एआईएमआईएम (AIMIM) के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी हैं। हालिया राजनीतिक बयानों और घटनाक्रमों ने इस संभावना को बल दिया है कि ये तीन प्रमुख नेता एक साथ आकर भाजपा और समाजवादी पार्टी (सपा) के नेतृत्व वाले गठबंधनों को चुनौती दे सकते हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि यह गठबंधन धरातल पर उतरता है, तो यह उत्तर प्रदेश के पारंपरिक दलित-मुस्लिम वोट बैंक के समीकरणों को पूरी तरह से बदल सकता है। पिछले कुछ चुनावों में मायावती की बसपा के कमजोर प्रदर्शन और चंद्रशेखर आजाद की बढ़ती लोकप्रियता ने नए गठजोड़ की जरूरत को जन्म दिया है। वहीं, असदुद्दीन ओवैसी लगातार उत्तर प्रदेश के मुस्लिम बहुल इलाकों में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं। ओवैसी के हालिया बयानों ने संकेत दिया है कि वे समान विचारधारा वाले दलों के साथ मिलकर चुनाव लड़ने के इच्छुक हैं, जो हाशिए पर मौजूद समुदायों की बात करते हैं।
इस संभावित गठबंधन का असर केवल भारत तक ही सीमित नहीं है, बल्कि विदेशों में रहने वाले भारतीय समुदाय, विशेषकर ऑस्ट्रेलिया में बसे उत्तर प्रदेश के प्रवासियों के बीच भी इसे लेकर काफी उत्सुकता है। सिडनी और मेलबर्न जैसे शहरों में बसे 'इंडियन डायस्पोरा' के लोग उत्तर प्रदेश की राजनीति पर बारीकी से नजर रखते हैं। प्रवासी भारतीयों के लिए उत्तर प्रदेश में राजनीतिक स्थिरता और विकास प्राथमिकता रहे हैं। इस तरह के गठबंधन की खबरों ने ऑस्ट्रेलिया में मौजूद सामाजिक संगठनों के बीच चर्चा छेड़ दी है कि क्या यह नया मोर्चा राज्य में एक मजबूत विकल्प पेश कर पाएगा।
हालांकि, इस गठबंधन की राह इतनी आसान भी नहीं है। मायावती का पिछला रिकॉर्ड रहा है कि वे बड़े दलों या अपने समकक्ष कद के नेताओं के साथ गठबंधन करने से परहेज करती रही हैं। इसके अलावा, चंद्रशेखर आजाद और मायावती के बीच 'दलित राजनीति के असली वारिस' को लेकर एक पुरानी प्रतिस्पर्धा रही है। विश्लेषकों का कहना है कि अगर ये नेता अपने व्यक्तिगत मतभेदों को दरकिनार कर एक मंच पर आते हैं, तो यह उत्तर प्रदेश में 'त्रिकोणीय मुकाबला' पैदा कर सकता है, जिससे मौजूदा सत्ताधारी दल और मुख्य विपक्षी दल दोनों की मुश्किलें बढ़ सकती हैं।
फिलहाल, आधिकारिक रूप से किसी भी दल ने गठबंधन की पुष्टि नहीं की है। लेकिन जिस तरह से सोशल मीडिया और सार्वजनिक रैलियों में इन नेताओं के स्वर एक-दूसरे के प्रति नरम हुए हैं, उसने उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक नई बहस छेड़ दी है। आने वाले महीनों में यह स्पष्ट हो जाएगा कि क्या यह केवल एक राजनीतिक कयासबाजी है या वास्तव में उत्तर प्रदेश एक बड़े उलटफेर का गवाह बनने जा रहा है।
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