ऑस्ट्रेलिया
ट्रंप का 'शांति समझौता': क्या अमेरिका को 'दुश्मन' बताने का ईरान का पुराना दांव अब खत्म होगा?
ICN24 Newsroom 20 जून 2026, 08:40 pm
विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान दशकों से घरेलू दमन से ध्यान हटाने के लिए अमेरिका को शत्रु बताता रहा है, लेकिन ट्रंप के साथ संभावित समझौता इस नैरेटिव को बदल सकता है।
वॉशिंगटन और तेहरान के बीच बढ़ते कूटनीतिक संकेतों ने दुनिया भर के भू-राजनीतिक विशेषज्ञों का ध्यान अपनी ओर खींचा है। विशेष रूप से नवनिर्वाचित अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरान के बीच एक संभावित 'शांति समझौते' की चर्चाओं ने इस सवाल को जन्म दिया है कि क्या ईरानी शासन अपने उस दशकों पुराने नैरेटिव को छोड़ पाएगा, जिसमें वह अमेरिका को 'ग्रेट शैतान' या मुख्य दुश्मन करार देता आया है। दशकों से, ईरान का इस्लामी गणतंत्र अपने देश के भीतर बढ़ते असंतोष और अपनी दमनकारी नीतियों से जनता का ध्यान भटकाने के लिए अमेरिका के खिलाफ नफरत को एक ढाल के रूप में इस्तेमाल करता रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का तर्क है कि ईरान के लिए अमेरिका को दुश्मन बनाए रखना केवल एक विदेश नीति नहीं, बल्कि शासन की स्थिरता के लिए एक 'जीवन रेखा' की तरह है। जब भी ईरान में महंगाई, बेरोजगारी या मानवाधिकारों के हनन को लेकर विरोध प्रदर्शन होते हैं, वहां का प्रशासन अक्सर इसे 'अमेरिकी साजिश' बताकर कुचल देता है। हालांकि, डोनाल्ड ट्रंप के साथ किसी भी प्रकार का समझौता इस बुनियादी ढांचे को हिला सकता है। ट्रंप की 'मैक्सिमम प्रेशर' यानी अधिकतम दबाव वाली नीति ने पहले ही ईरान की अर्थव्यवस्था को कमजोर किया है, और अब एक नई डील की संभावना तेहरान को एक कठिन चौराहे पर खड़ा कर देती है।
ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले भारतीय समुदाय के लिए यह घटनाक्रम काफी महत्वपूर्ण है। पश्चिम एशिया (मिडल ईस्ट) में किसी भी प्रकार की स्थिरता या अस्थिरता का सीधा असर वैश्विक तेल कीमतों पर पड़ता है, जिससे ऑस्ट्रेलिया में ईंधन के दाम प्रभावित होते हैं। इसके अलावा, खाड़ी देशों में लगभग 90 लाख भारतीय प्रवासी रहते हैं। अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम होने से न केवल क्षेत्रीय सुरक्षा बढ़ेगी, बल्कि भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई परिवारों के उन रिश्तेदारों की सुरक्षा भी सुनिश्चित होगी जो व्यापार या नौकरी के सिलसिले में उस क्षेत्र में बसे हुए हैं। भारत और ऑस्ट्रेलिया दोनों ही क्वाड (QUAD) के सदस्य के रूप में हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शांति चाहते हैं, और ईरान-अमेरिका संबंधों में सुधार इस व्यापक लक्ष्य में सहायक हो सकता है।
विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि यदि ट्रंप और ईरान के बीच कोई समझौता होता है, तो ईरान के कट्टरपंथियों को अपनी जनता को जवाब देना भारी पड़ सकता है। सालों से जिस देश को 'बुराई का प्रतीक' बताया गया, अचानक उसके साथ मेज पर बैठना ईरान के आंतरिक प्रचार तंत्र (Propaganda) को विफल कर सकता है। हालांकि, सवाल यह भी है कि क्या ट्रंप वास्तव में ईरान की परमाणु महत्वाकांक्षाओं पर अंकुश लगा पाएंगे या यह केवल एक अल्पकालिक कूटनीतिक जीत होगी। आने वाले महीनों में व्हाइट हाउस की नीतियां यह तय करेंगी कि क्या ईरान अपने 'दुश्मन' के बिना अपना वजूद बचा पाएगा या वह विरोध का कोई नया जरिया तलाशेगा।
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