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सहानुभूति और बदलाव: मनोवैज्ञानिक कार्ल रोजर्स के विचार और भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई समुदाय के लिए उनकी प्रासंगिकता
ICN24 Newsroom 20 जून 2026, 09:52 am
प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक कार्ल रोजर्स के सहानुभूति और मानवीय संबंधों पर विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं, विशेषकर प्रवासी समुदायों के लिए।
मानवतावादी मनोविज्ञान के संस्थापकों में से एक, कार्ल रोजर्स ने एक बार कहा था, "अगर मैं खुद को वास्तव में दूसरे व्यक्ति को समझने दूँ, तो मैं बदल सकता हूँ।" यह सरल सा दिखने वाला विचार वास्तव में मानवीय संबंधों की एक गहरी सच्चाई को उजागर करता है। रोजर्स का मानना था कि किसी दूसरे व्यक्ति के दृष्टिकोण को पूरी तरह से अपनाना और उसे बिना किसी पूर्वग्रह के समझना, एक साहसी कार्य है क्योंकि इसमें स्वयं के विचारों के बदलने का जोखिम होता है। ऑस्ट्रेलिया में बसे भारतीय समुदाय के लिए, जहाँ दो संस्कृतियों का मिलन होता है, रोजर्स के यह सिद्धांत न केवल व्यक्तिगत विकास के लिए बल्कि सामाजिक सामंजस्य के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
कार्ल रोजर्स ने 'क्लाइंट-केंद्रित चिकित्सा' (Client-centered therapy) की नींव रखी थी, जिसका मुख्य स्तंभ 'सहानुभूति' या एम्पैथी है। उनके अनुसार, सहानुभूति का अर्थ केवल दूसरे के दुख में दुखी होना नहीं है, बल्कि उसके संसार को उसकी आँखों से देखना है। जब हम किसी दूसरे व्यक्ति को गहराई से समझने की कोशिश करते हैं, तो हमारे अपने विश्वासों और धारणाओं को चुनौती मिलती है। यही वह बिंदु है जहाँ अक्सर लोग डर जाते हैं। रोजर्स ने तर्क दिया कि यह डर ही हमें वास्तविक जुड़ाव से रोकता है। हम अक्सर दूसरों की बातों को इसलिए अनसुना कर देते हैं क्योंकि हमें डर होता है कि उनकी सच्चाई हमारी अपनी पहचान या सोच को बदल देगी।
भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई समुदाय के संदर्भ में, यह दर्शन विशेष महत्व रखता है। एक प्रवासी के रूप में, व्यक्ति अक्सर अपनी मूल संस्कृति और नई ऑस्ट्रेलियाई जीवनशैली के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करता है। कई बार, पुरानी पीढ़ी और नई पीढ़ी के बीच वैचारिक मतभेद उत्पन्न होते हैं। यहाँ रोजर्स का 'गहन बोध' (Deep Understanding) का सिद्धांत काम आता है। यदि माता-पिता और बच्चे एक-दूसरे के दृष्टिकोण को बिना किसी रक्षात्मक रवैये के सुनने का प्रयास करें, तो न केवल आपसी मतभेद कम होंगे बल्कि रिश्तों में एक नई परिपक्वता आएगी।
इसके अलावा, ऑस्ट्रेलिया जैसे बहुसांस्कृतिक समाज में, विभिन्न पृष्ठभूमियों के लोगों के साथ घुलने-मिलने के लिए भी सहानुभूति की आवश्यकता होती है। जब हम किसी भिन्न पृष्ठभूमि वाले सहकर्मी या पड़ोसी को वास्तव में समझने की अनुमति देते हैं, तो हम केवल उनके बारे में ही नहीं सीखते, बल्कि अपने भीतर के संकीर्ण दायरे को भी तोड़ते हैं। यह 'बदलाव' ही वह विकास है जिसकी बात रोजर्स ने की थी। यह हमें अधिक लचीला, दयालु और समझदार बनाता है।
अंततः, कार्ल रोजर्स का यह 'आज का विचार' हमें याद दिलाता है कि सहानुभूति कोई कमजोरी नहीं, बल्कि एक शक्ति है। यह हमें असुरक्षा की भावनाओं से ऊपर उठकर एक ऐसे समाज के निर्माण की ओर ले जाती है जहाँ हर व्यक्ति को सुना और समझा जाता है। भारतीय समुदाय के लिए, अपनी जड़ों से जुड़े रहते हुए नई पहचान को अपनाने की प्रक्रिया में यह मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण एक मार्गदर्शक की भूमिका निभा सकता है। वास्तविक जुड़ाव की शुरुआत हमेशा सुनने और समझने के साहस से होती है।
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