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देवी भागवत की अनोखी कथा: जब शिव के श्राप से एक राजा एक महीने पुरुष और एक महीने स्त्री बनने लगा
ICN24 Newsroom 7 जून 2026, 06:30 pm

देवी भागवत पुराण की यह पौराणिक कथा राजा सुद्युम्न और इला के जीवन के इर्द-गिर्द घूमती है, जो शिव के श्राप के कारण लिंग परिवर्तन के चक्र में फंस गए थे।
भारतीय पौराणिक साहित्य केवल धर्म और दर्शन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें जीवन के उन पहलुओं का भी वर्णन मिलता है जो आधुनिक समाज में चर्चा का विषय बने हुए हैं। देवी भागवत महापुराण में वर्णित राजा सुद्युम्न की कथा एक ऐसा ही उदाहरण है, जो लिंग पहचान और दैवीय न्याय की जटिलताओं को दर्शाती है। यह कथा आज के समय में भी उतनी ही प्रासंगिक है, विशेषकर ऑस्ट्रेलिया जैसे बहुसांस्कृतिक समाज में रहने वाले भारतीय समुदाय के लिए, जो अपनी जड़ों और सांस्कृतिक विरासत को समझने का प्रयास कर रहे हैं।
पौराणिक कथा के अनुसार, राजा सुद्युम्न एक शक्तिशाली शासक थे। एक बार शिकार के दौरान वे अपने सैनिकों के साथ हिमालय की तलहटी में स्थित 'कुमार वन' में प्रवेश कर गए। उन्हें इस बात का ज्ञान नहीं था कि भगवान शिव ने उस वन को अभिशप्त किया था। माता पार्वती की निजता की रक्षा के लिए शिव ने यह नियम बनाया था कि जो भी पुरुष इस वन में प्रवेश करेगा, वह तत्काल स्त्री बन जाएगा। जैसे ही सुद्युम्न और उनके साथी वन की सीमा में आए, वे सभी स्त्रियों में परिवर्तित हो गए। राजा सुद्युम्न अब 'इला' बन चुके थे।
अपनी इस स्थिति से व्याकुल होकर सुद्युम्न ने भगवान शिव की शरण ली और उनसे पुनः पुरुष रूप प्रदान करने की प्रार्थना की। महादेव ने उनके भक्ति भाव को देखते हुए श्राप में ढील दी, लेकिन उसे पूरी तरह समाप्त नहीं किया। शिव के वरदान और श्राप के मिश्रण के परिणामस्वरूप, राजा सुद्युम्न को एक विचित्र जीवन मिला। वे एक महीने पुरुष (सुद्युम्न) के रूप में रहते और अगले महीने स्त्री (इला) के रूप में। जब वे पुरुष होते, तो उन्हें स्त्री रूप की यादें नहीं रहती थीं और जब वे स्त्री बनते, तो उन्हें अपने पुरुष होने का आभास नहीं होता था।
इला के रूप में उनके जीवन में एक नया मोड़ तब आया जब उनकी भेंट चंद्रमा के पुत्र बुध से हुई। दोनों के मिलन से 'पुरुरवा' का जन्म हुआ, जो आगे चलकर चंद्रवंश के प्रतापी राजा बने। यह कथा न केवल दैवीय चमत्कारों को दर्शाती है, बल्कि यह भी बताती है कि प्राचीन भारतीय ग्रंथों में लिंग की तरलता (gender fluidity) और अस्तित्व के विभिन्न रूपों को किस प्रकार स्वीकार किया गया था।
ऑस्ट्रेलिया में बसने वाली नई पीढ़ी के लिए ये कथाएं केवल धार्मिक पाठ नहीं हैं, बल्कि ये एक ऐसे विमर्श का हिस्सा हैं जो विविधता और समावेशिता की बात करता है। भारतीय समुदाय के बुजुर्गों का मानना है कि इन कहानियों के माध्यम से युवा पीढ़ी अपनी पौराणिक मान्यताओं के उदार स्वरूप को समझ सकती है। यह कथा सिखाती है कि नियति के बदलावों को स्वीकार करना और हर परिस्थिति में धर्म का पालन करना ही मनुष्य का वास्तविक कर्तव्य है।
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