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तसलीमा नसरीन की गुहार: 'स्वदेश बांग्लादेश लौटना चाहती हूँ, लेकिन राह में खड़ी हैं कानूनी बाधाएं'

ICN24 Newsroom 6 अग॰ 2026, 06:37 am
तसलीमा नसरीन की गुहार: 'स्वदेश बांग्लादेश लौटना चाहती हूँ, लेकिन राह में खड़ी हैं कानूनी बाधाएं'

निर्वासित लेखिका तसलीमा नसरीन ने बांग्लादेश लौटने की अपनी तीव्र इच्छा व्यक्त की है, लेकिन पासपोर्ट नवीनीकरण न होने के कारण वे स्वदेश नहीं जा पा रही हैं।

विख्यात और विवादित लेखिका तसलीमा नसरीन ने एक बार फिर अपनी मातृभूमि बांग्लादेश लौटने की गहरी इच्छा व्यक्त की है। लगभग तीन दशकों से निर्वासन का जीवन जी रही नसरीन ने स्पष्ट किया है कि वे अपने देश वापस जाना चाहती हैं, लेकिन उनके पास वैध यात्रा दस्तावेज़ नहीं हैं। उनके अनुसार, बांग्लादेश सरकार द्वारा उनके पासपोर्ट का नवीनीकरण न किया जाना उनकी घर वापसी की राह में सबसे बड़ी बाधा बना हुआ है। तसलीमा नसरीन, जो अपने बेबाक लेखन और कट्टरपंथ के खिलाफ आवाज़ उठाने के लिए जानी जाती हैं, 1994 से ही बांग्लादेश से बाहर रहने को मजबूर हैं। हाल ही में उन्होंने मीडिया से बात करते हुए अपनी पीड़ा साझा की। उन्होंने बताया कि हालांकि वे भारत को अपना दूसरा घर मानती हैं और यहाँ सुरक्षित महसूस करती हैं, लेकिन अपनी मिट्टी की याद उन्हें आज भी सताती है। तसलीमा ने कहा कि वे केवल अपनी जड़ों से जुड़ना चाहती हैं और अपने परिवार व पुराने परिवेश को देखना चाहती हैं, लेकिन राजनीतिक और प्रशासनिक कारणों से उन्हें यह अवसर नहीं मिल पा रहा है। विशेष रूप से, तसलीमा नसरीन ने हाल ही में 19 साल के लंबे अंतराल के बाद कोलकाता का दौरा किया। पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता उनके लिए भावनात्मक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण रही है, क्योंकि यहाँ की भाषा और संस्कृति उनके गृह देश बांग्लादेश से काफी मिलती-जुलती है। उन्होंने संकेत दिया कि वे आने वाले समय में कोलकाता की और भी यात्राएं करने की योजना बना रही हैं। उनके समर्थकों का मानना है कि कोलकाता के साथ उनका जुड़ाव उन्हें अपनी सांस्कृतिक जड़ों के करीब रहने का अहसास कराता है। ऑस्ट्रेलिया में बसे भारतीय-प्रवासी समुदाय के लिए तसलीमा नसरीन का मुद्दा केवल एक लेखिका के निर्वासन का नहीं, बल्कि अभिव्यक्ति की आज़ादी और मानवाधिकारों से जुड़ा विषय है। सिडनी और मेलबर्न जैसे शहरों में रहने वाले दक्षिण एशियाई बुद्धिजीवी अक्सर इस बात पर चर्चा करते हैं कि कैसे असहमति की आवाज़ को दबाने के लिए नागरिकता और यात्रा अधिकारों का उपयोग एक हथियार के रूप में किया जाता है। तसलीमा के मामले में, पासपोर्ट का नवीनीकरण न होना उन्हें एक 'वैधानिक शून्य' में धकेलता है, जहाँ वे अपनी इच्छा के बावजूद अपने देश की सीमा में प्रवेश नहीं कर सकतीं। तसलीमा नसरीन की यह अपील ऐसे समय में आई है जब बांग्लादेश में राजनीतिक समीकरण बदल रहे हैं, लेकिन उनके प्रति वहां के कट्टरपंथी समूहों का रुख अभी भी कड़ा बना हुआ है। लेखिका ने स्पष्ट किया कि वे किसी भी तरह के राजनीतिक विवाद में नहीं पड़ना चाहतीं, बस एक नागरिक के रूप में अपने देश लौटने का अधिकार चाहती हैं। फिलहाल, वे भारत में ही रह रही हैं और अपनी नई रचनाओं के माध्यम से अपने अनुभव साझा कर रही हैं। उनकी इस ताजा गुहार ने एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मानवाधिकारों और लेखकों की सुरक्षा के मुद्दे को गरमा दिया है।
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