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भारतीय वैज्ञानिकों ने सुलझाई देसी मुर्गियों की सहनशक्ति की पहेली: शोध में हुआ बड़ा खुलासा
ICN24 Newsroom 5 जुल॰ 2026, 01:31 pm

तमिलनाडु के वैज्ञानिकों ने देसी मुर्गियों के उन जैविक रहस्यों का पता लगाया है जो उन्हें खराब मौसम और बीमारियों से लड़ने में सक्षम बनाते हैं।
तमिलनाडु पशु चिकित्सा और पशु विज्ञान विश्वविद्यालय (TANUVAS) के नेतृत्व में किए गए एक नवीनतम अध्ययन ने भारतीय देसी मुर्गियों की असाधारण सहनशक्ति के पीछे के वैज्ञानिक कारणों को सफलतापूर्वक डिकोड किया है। यह शोध कृषि विज्ञान के क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है, क्योंकि यह बताता है कि कैसे ये पक्षी विभिन्न प्रकार की प्रतिकूल परिस्थितियों और विविध उत्पादन प्रणालियों में न केवल जीवित रहते हैं, बल्कि बेहतर प्रदर्शन भी करते हैं।
इस अध्ययन का मुख्य केंद्र 'एपिजेनेटिक्स' (Epigenetics) रहा है। वैज्ञानिकों ने पाया कि देसी मुर्गियों में कुछ विशिष्ट रासायनिक बदलाव होते हैं जो उनके डीएनए के अनुक्रम को बदले बिना ही उनके जीन की कार्यप्रणाली को नियंत्रित करते हैं। यही कारण है कि असील या कड़कनाथ जैसी भारतीय नस्लें अत्यधिक गर्मी, पोषण की कमी और स्थानीय बीमारियों के प्रति विदेशी नस्लों की तुलना में अधिक प्रतिरोधी होती हैं।
भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई संदर्भ में इस शोध का विशेष महत्व है। ऑस्ट्रेलिया में भी पशुपालन और कुक्कुट पालन (poultry farming) एक प्रमुख उद्योग है, जहाँ जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ते तापमान से निपटने के लिए नई तकनीकों की तलाश की जा रही है। भारतीय मूल के वैज्ञानिक और शोधकर्ता, जो ऑस्ट्रेलिया के कृषि विश्वविद्यालयों में कार्यरत हैं, अक्सर इस प्रकार के आनुवंशिक डेटा का उपयोग करके अधिक टिकाऊ और लचीली नस्लों को विकसित करने की दिशा में काम करते हैं।
शोध दल ने बताया कि स्वदेशी मुर्गियों ने सदियों से स्थानीय पर्यावरण के साथ तालमेल बिठाया है। अध्ययन के अनुसार, इन पक्षियों की कोशिकाएं तनाव के समय विशेष प्रकार के प्रोटीन का उत्पादन करती हैं, जो उन्हें बीमारियों से लड़ने की अतिरिक्त शक्ति प्रदान करता है। यह खोज भविष्य में ऐसी नई संकर नस्लों (hybrid breeds) को विकसित करने में मदद कर सकती है जो कम संसाधनों में अधिक उत्पादन दे सकें।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह अध्ययन न केवल भारत में खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने में मदद करेगा, बल्कि वैश्विक स्तर पर स्थायी कृषि (sustainable agriculture) के मॉडल को भी मजबूती देगा। ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में, जहाँ भारतीय समुदाय के लोग कृषि और जैविक खेती (organic farming) में सक्रिय रूप से शामिल हो रहे हैं, वहां देशी नस्लों की इन विशेषताओं के बारे में जागरूकता बढ़ना फायदेमंद साबित हो सकता है।
अंततः, TANUVAS की यह रिपोर्ट यह रेखांकित करती है कि आनुवंशिक संरक्षण क्यों आवश्यक है। यदि हम अपनी स्वदेशी प्रजातियों की इन खूबियों को समझ लेते हैं, तो भविष्य में जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों का सामना करना बहुत आसान हो जाएगा। यह शोध जल्द ही अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक पत्रिकाओं में प्रकाशित होने की उम्मीद है, जिससे वैश्विक वैज्ञानिक समुदाय के बीच भारतीय कृषि अनुसंधान की साख और बढ़ेगी।
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