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किशोर अपराध की बढ़ती दर: देश में तीसरे स्थान पर पहुँचा नाबालिगों का अपराध ग्राफ

ICN24 Newsroom 8 जून 2026, 11:00 am
किशोर अपराध की बढ़ती दर: देश में तीसरे स्थान पर पहुँचा नाबालिगों का अपराध ग्राफ

भारत में किशोर अपराधों में चिंताजनक वृद्धि देखी जा रही है, जहाँ नाबालिगों की संलिप्तता अब देश में तीसरे स्थान पर पहुँच गई है। सोशल मीडिया और पारिवारिक कलह इसके मुख्य कारण बताए जा रहे हैं।

भारत में कानून व्यवस्था और सामाजिक ढांचे के सामने एक गंभीर चुनौती उभरकर सामने आई है। हालिया आंकड़ों के अनुसार, अपराधों में नाबालिगों की संलिप्तता के मामले देश में तीसरे उच्चतम स्तर पर पहुंच गए हैं। यह स्थिति न केवल सुरक्षा एजेंसियों के लिए चिंता का विषय है, बल्कि समाजशास्त्रियों और नीति निर्माताओं के लिए भी एक चेतावनी है। विशेषज्ञों का मानना है कि किशोरावस्था में बढ़ती यह आक्रामकता केवल एक कानूनी मुद्दा नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरे सामाजिक और मनोवैज्ञानिक कारण छिपे हैं। मनोवैज्ञानिकों और अपराध विशेषज्ञों ने इस बढ़ते ग्राफ के पीछे सोशल मीडिया और अनियंत्रित इंटरनेट सामग्री को मुख्य कारक माना है। आज के दौर में किशोरों की पहुंच हिंसक वीडियो गेम्स और ऐसे डिजिटल कंटेंट तक आसान हो गई है, जो उन्हें हिंसा के प्रति असंवेदनशील बना रहे हैं। लगातार हिंसक दृश्यों को देखने से बच्चों के व्यवहार में बदलाव आ रहा है और वे वास्तविक जीवन में भी कानून का उल्लंघन करने से नहीं हिचकिचा रहे हैं। पारिवारिक वातावरण भी इस समस्या की एक बड़ी जड़ बनकर उभरा है। रिपोर्टों के अनुसार, टूटे हुए परिवार, माता-पिता के बीच निरंतर कलह और घर पर उचित पर्यवेक्षण (supervision) की कमी बच्चों को गलत रास्ते पर धकेल रही है। जब बच्चों को घर में भावनात्मक असुरक्षा महसूस होती है, तो वे अक्सर बाहरी तत्वों या आपराधिक समूहों के प्रभाव में आ जाते हैं। इसके साथ ही, कम उम्र में नशीले पदार्थों तक पहुंच ने इस समस्या को और भी भयावह बना दिया है। ऑस्ट्रेलिया में बसे भारतीय समुदाय के संदर्भ में भी यह मुद्दा प्रासंगिक है। प्रवासी परिवारों के लिए दोहरी संस्कृतियों के बीच सामंजस्य बिठाना और नई पीढ़ी पर डिजिटल निगरानी रखना एक बड़ी चुनौती है। सिडनी और मेलबर्न जैसे शहरों में भी किशोरों के बीच बढ़ती असामाजिक गतिविधियों को लेकर सामुदायिक चर्चाएं तेज हुई हैं। भारतीय माता-पिता के लिए यह आवश्यक हो गया है कि वे अपने बच्चों के डिजिटल जीवन और उनके मानसिक स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान दें। सरकार और सामाजिक संगठनों द्वारा अब इस दिशा में ठोस कदम उठाने की मांग की जा रही है। केवल कठोर कानून बनाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि स्कूलों में परामर्श सत्र, सामुदायिक जागरूकता कार्यक्रम और साइबर सुरक्षा पर जोर देना अनिवार्य है। यदि समय रहते इन किशोरों को सही मार्गदर्शन नहीं मिला, तो भविष्य में एक बड़ी आबादी के अपराधीकरण का खतरा मंडरा रहा है। यह समय अभिभावकों के लिए भी सचेत होने का है ताकि वे अपने बच्चों को एक स्वस्थ और सुरक्षित वातावरण प्रदान कर सकें।
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