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ग्राहम स्टेन्स हत्याकांड: दारा सिंह की रिहाई पर 19 अगस्त तक फैसला करे ओडिशा सरकार, सुप्रीम कोर्ट का निर्देश

ICN24 Admin 16 जुल॰ 2026, 03:46 am
ग्राहम स्टेन्स हत्याकांड: दारा सिंह की रिहाई पर 19 अगस्त तक फैसला करे ओडिशा सरकार, सुप्रीम कोर्ट का निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने ओडिशा सरकार को निर्देश दिया है कि वह ऑस्ट्रेलियाई मिशनरी ग्राहम स्टेन्स और उनके बेटों की हत्या के दोषी दारा सिंह की रिहाई पर 19 अगस्त तक निर्णय ले।

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने ओडिशा सरकार को एक महत्वपूर्ण निर्देश जारी करते हुए 19 अगस्त तक यह तय करने को कहा है कि क्या दारा सिंह को जेल से समय से पहले रिहा किया जाना चाहिए। दारा सिंह, जिसका कानूनी नाम रवींद्र कुमार पाल है, वर्तमान में 1999 में ऑस्ट्रेलियाई मिशनरी ग्राहम स्टुअर्ट स्टेन्स और उनके दो मासूम बेटों की हत्या के लिए आजीवन कारावास की सजा काट रहा है। न्यायमूर्ति ऋषिकेश रॉय और न्यायमूर्ति एसवीएन भट्टी की पीठ ने यह आदेश दारा सिंह द्वारा दायर उस याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया, जिसमें उसने अपनी लंबी सजा और अच्छे आचरण के आधार पर रिहाई की गुहार लगाई है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यह निर्देश दारा सिंह की रिहाई या दोषमुक्ति का आदेश नहीं है। यह केवल एक प्रक्रियात्मक समय-सीमा है जिसके भीतर राज्य सरकार को सिंह के छूट (Remission) आवेदन पर विचार करना होगा और अपना औपचारिक निर्णय प्रस्तुत करना होगा। दारा सिंह पिछले 25 वर्षों से अधिक समय से सलाखों के पीछे है और उसने राज्य की क्षमा नीति के तहत अपनी रिहाई की मांग की है। रिपोर्टों के अनुसार, सजा समीक्षा अधिकारियों ने पहले ही उसके आवेदन पर विचार कर लिया है, और अब अंतिम निर्णय ओडिशा सरकार के पाले में है। ग्राहम स्टेन्स एक ऑस्ट्रेलियाई ईसाई मिशनरी थे, जिन्होंने अपना जीवन ओडिशा में कुष्ठ रोगियों और वंचित समुदायों की सेवा में समर्पित कर दिया था। 22-23 जनवरी, 1999 की रात को ओडिशा के क्योंझर जिले के मनोहरपुर गांव में एक हृदयविदारक घटना घटी। स्टेन्स और उनके दो बेटे, 10 वर्षीय फिलिप और 6 वर्षीय टिमोथी, अपनी स्टेशन वैगन में सो रहे थे, तभी एक हिंसक भीड़ ने वाहन को चारों ओर से घेर लिया और उसमें आग लगा दी। इस हमले में स्टेन्स और उनके दोनों बच्चे जिंदा जल गए, जिससे न केवल भारत बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी गहरा आक्रोश फैल गया था। कानूनी इतिहास पर नजर डालें तो दारा सिंह को निचली अदालत ने शुरू में मौत की सजा सुनाई थी। हालांकि, 2005 में उड़ीसा उच्च न्यायालय ने इस सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया, जिसे 2011 में सर्वोच्च न्यायालय ने भी बरकरार रखा। शीर्ष अदालत ने तब इस मामले को एक 'जघन्य अपराध' करार दिया था, लेकिन इसे 'दुर्लभ से दुर्लभतम' श्रेणी में नहीं माना था जिसके लिए फांसी दी जाए। यह मामला आज भी धार्मिक सहिष्णुता और अल्पसंख्यक समुदायों की सुरक्षा के दृष्टिकोण से भारत में अत्यंत संवेदनशील माना जाता है। रिहाई के समर्थकों का तर्क है कि कानून के तहत हर कैदी को सुधार और पुनर्वास का अवसर मिलना चाहिए, विशेषकर तब जब उसने ढाई दशक की सजा काट ली हो। वहीं, विरोधियों का मानना है कि अपराध की क्रूरता और बच्चों की हत्या को देखते हुए ऐसी रिहाई समाज में गलत संदेश दे सकती है। इस फैसले पर ऑस्ट्रेलिया के मानवाधिकार समूहों और भारतीय ईसाई समुदाय की भी पैनी नजर बनी हुई है।
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