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मध्य प्रदेश में छात्रसंघ चुनावों की वापसी: 'मुन्नाभाई' स्टाइल आंदोलन से लेकर हाईकोर्ट की सख्ती तक की कहानी

ICN24 Newsroom 5 अग॰ 2026, 11:37 am
मध्य प्रदेश में छात्रसंघ चुनावों की वापसी: 'मुन्नाभाई' स्टाइल आंदोलन से लेकर हाईकोर्ट की सख्ती तक की कहानी

मध्य प्रदेश में 9 साल बाद छात्रसंघ चुनाव का रास्ता साफ हो गया है। हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के बाद सरकार सितंबर 2026 में चुनाव कराएगी।

मध्य प्रदेश में करीब नौ वर्षों के लंबे इंतजार के बाद छात्र राजनीति की मुख्यधारा में वापसी होने जा रही है। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की सख्ती के बाद राज्य सरकार ने शैक्षणिक सत्र 2026-27 के दौरान सितंबर महीने में छात्रसंघ चुनाव कराने का लिखित आश्वासन दिया है। इस फैसले ने राज्य के राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज कर दी है, जहां सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों ही इसे अपनी वैचारिक जीत बता रहे हैं। छात्र राजनीति को अक्सर 'लोकतंत्र की नर्सरी' कहा जाता है, जिसने मध्य प्रदेश को मुख्यमंत्री मोहन यादव जैसे कद्दावर नेता दिए हैं। इस संघर्ष की कहानी में फिल्म 'मुन्नाभाई MBBS' से प्रेरित एक दिलचस्प घटनाक्रम भी शामिल है। मध्य प्रदेश कांग्रेस के प्रवक्ता विवेक त्रिपाठी ने बताया कि 2016-17 के दौरान छात्रसंघ चुनाव की बहाली के लिए अनोखा 'गेट वेल सून' अभियान चलाया गया था। तत्कालीन उच्च शिक्षा मंत्री जयभान सिंह पवैया से मुलाकात न होने पर छात्रों ने करीब 2.5 लाख 'गेट वेल सून' संदेश भेजे थे। त्रिपाठी के अनुसार, इस गांधीवादी विरोध के बाद भी सरकार नहीं मानी और अंततः घेराव और गिरफ्तारियां हुईं। उन्होंने साझा किया कि छात्र हितों के लिए लड़ते हुए उन्हें जेल भी जाना पड़ा, जो उनके राजनीतिक जीवन का एक महत्वपूर्ण मोड़ था। ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखें तो मध्य प्रदेश में छात्र राजनीति का सफर काफी उतार-चढ़ाव भरा रहा है। साल 2003 में भाजपा सरकार ने प्रत्यक्ष प्रणाली के चुनावों पर रोक लगा दी थी। इसके बाद 2006 तक अप्रत्यक्ष चुनाव हुए, लेकिन उज्जैन में प्रोफेसर एच.एस. सभरवाल की दुखद हत्या के बाद यह प्रक्रिया पूरी तरह ठप हो गई। हालांकि 2017 में एक बार फिर चुनाव हुए थे, लेकिन उसके बाद कोरोना महामारी और अन्य प्रशासनिक कारणों का हवाला देकर चुनावों को लगातार टाला जाता रहा। जबलपुर के छात्र अदनान अंसारी द्वारा दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया, जिसके बाद सरकार को चुनाव कराने की समयसीमा तय करनी पड़ी। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) ने इस फैसले का स्वागत करते हुए इसे छात्रों के लोकतांत्रिक अधिकारों की जीत बताया है। एबीवीपी ने मांग की है कि आगामी चुनाव लिंगदोह समिति की सिफारिशों और अकादमिक कैलेंडर के अनुसार पारदर्शी तरीके से आयोजित किए जाएं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि छात्रसंघों की अनुपस्थिति ने राज्य में नए नेतृत्व के उभरने की प्रक्रिया को प्रभावित किया है। कांग्रेस और एनएसयूआई का तर्क है कि यदि छात्रसंघ सक्रिय होते, तो नीट (NEET) जैसी परीक्षाओं से जुड़े विवादों में छात्रों की आवाज अधिक प्रभावी ढंग से उठाई जा सकती थी। अब जबकि 2026 की तारीख तय हो चुकी है, राज्य के महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में एक बार फिर चुनावी सरगर्मी लौटने की उम्मीद है।
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