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ईरान-इजरायल संघर्ष: सैन्य संसाधनों की कमी और बढ़ती लागत ने अमेरिका के सामने खड़ा किया रणनीतिक संकट

ICN24 Newsroom 20 अग॰ 2026, 05:38 pm
ईरान-इजरायल संघर्ष: सैन्य संसाधनों की कमी और बढ़ती लागत ने अमेरिका के सामने खड़ा किया रणनीतिक संकट

ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते तनाव और अमेरिकी सैन्य संसाधनों की कमी ने वाशिंगटन के लिए युद्ध के मैदान में विकल्प सीमित कर दिए हैं, जिसका असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ना तय है।

ईरान और इजरायल के बीच बढ़ता सैन्य तनाव अब एक ऐसे मोड़ पर पहुँच गया है जहाँ संयुक्त राज्य अमेरिका के लिए अपनी भूमिका और संसाधनों का संतुलन बनाना कठिन होता जा रहा है। हालिया रिपोर्टों और सामरिक विश्लेषणों से संकेत मिलता है कि मध्य पूर्व में लगातार जारी इस संघर्ष ने अमेरिकी रक्षा भंडार पर भारी दबाव डाला है। विशेष रूप से, महत्वपूर्ण युद्ध सामग्री (munitions) की कमी और युद्ध की बढ़ती लागत ने न केवल वर्तमान जो बाइडन प्रशासन, बल्कि पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की भविष्य की संभावित विदेश नीतियों के लिए भी गंभीर चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। वाशिंगटन में रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका जिस तरह से इजरायल की सुरक्षा के लिए इंटरसेप्टर मिसाइलों और अन्य उन्नत रक्षा प्रणालियों का उपयोग कर रहा है, उससे उसके अपने भंडार खाली हो रहे हैं। लाल सागर में हूतियों के खिलाफ अभियान और ईरान द्वारा दागी गई मिसाइलों को रोकने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली एसएम-3 (SM-3) मिसाइलों की उत्पादन दर मांग के मुकाबले काफी कम है। यह स्थिति अमेरिका को एक ऐसे जाल में फंसा सकती है जहाँ उसके पास भविष्य में किसी बड़े क्षेत्रीय युद्ध से बाहर निकलने के रास्ते (exit strategies) बेहद सीमित रह जाएंगे। भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई समुदाय के लिए यह घटनाक्रम विशेष चिंता का विषय है। मध्य पूर्व में अस्थिरता का सीधा असर वैश्विक तेल कीमतों पर पड़ता है, जिससे ऑस्ट्रेलिया में ईंधन की दरें प्रभावित होती हैं। इसके अतिरिक्त, खाड़ी देशों में रहने वाले लाखों प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा और वहां से भारत आने वाले धन (remittances) पर भी इस संघर्ष का प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। ऑस्ट्रेलिया, जो क्वाड (QUAD) और ऑकस (AUKUS) के माध्यम से हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका का एक प्रमुख सहयोगी है, के लिए भी यह स्थिति चिंताजनक है क्योंकि अमेरिका का ध्यान मध्य पूर्व में केंद्रित होने से प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा प्राथमिकताओं पर असर पड़ सकता है। डोनाल्ड ट्रंप के पिछले कार्यकाल की 'मैक्सिमम प्रेशर' नीति ने ईरान को आर्थिक रूप से कमजोर करने की कोशिश की थी, लेकिन वर्तमान परिदृश्य में उनके पास भी विकल्प कम ही नजर आते हैं। यदि अमेरिका युद्ध की लागत वहन करने में असमर्थ होता है या उसके भंडार समाप्त हो जाते हैं, तो उसे कूटनीतिक रूप से पीछे हटना पड़ सकता है, जो वैश्विक मंच पर उसकी साख को प्रभावित करेगा। विश्लेषकों का कहना है कि सैन्य संसाधनों का यह संकट केवल एक रणनीतिक समस्या नहीं है, बल्कि यह एक बड़ा आर्थिक बोझ भी है जो अमेरिकी करदाताओं और अंततः वैश्विक बाजारों को प्रभावित कर रहा है। निष्कर्ष के तौर पर, अमेरिका के लिए अब समय आ गया है कि वह अपनी सैन्य प्रतिबद्धताओं और वास्तविक संसाधनों के बीच सामंजस्य बिठाए। ईरान के साथ बढ़ते तनाव के बीच यदि कोई ठोस समाधान नहीं निकलता, तो यह अनिश्चितता न केवल मध्य पूर्व बल्कि भारत और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों के आर्थिक हितों को भी नुकसान पहुँचाती रहेगी।
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