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'अपने शरीर से ही जंग': एंटी-एजिंग और सुंदर दिखने की होड़ ने ऑस्ट्रेलियाई महिलाओं की मुश्किलें बढ़ाईं

ICN24 Newsroom 7 जुल॰ 2026, 05:31 pm
'अपने शरीर से ही जंग': एंटी-एजिंग और सुंदर दिखने की होड़ ने ऑस्ट्रेलियाई महिलाओं की मुश्किलें बढ़ाईं

ऑस्ट्रेलिया में तेजी से बढ़ते 'एंटी-एजिंग' और 'लॉन्जिविटी' उद्योग के बीच, भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई समुदाय सहित यहां की महिलाएं उम्र छिपाने और सौंदर्य मानकों के बढ़ते दबाव से जूझ रही हैं।

ऑस्ट्रेलिया में आज के दौर में 'एंटी-एजिंग' (उम्र के असर को रोकने) और 'लॉन्जिविटी' (दीर्घायु) का कारोबार कई अरब डॉलर के उद्योग में तब्दील हो चुका है। मेनोपॉज (रजोनिवृत्ति) से जुड़ी दवाओं से लेकर त्वचा को जवां बनाए रखने वाले उत्पादों तक, बाजार अब उम्र बढ़ने की प्राकृतिक प्रक्रिया को एक समस्या के रूप में पेश कर रहा है। लेकिन इस चकाचौंध के पीछे एक कड़वी हकीकत छिपी है—ऑस्ट्रेलियाई महिलाएं, विशेषकर मध्यम आयु वर्ग की महिलाएं, एक ऐसी लड़ाई लड़ रही हैं जिसमें जीत मुमकिन नहीं है। वे आज भी अपने ही शरीर के साथ 'युद्ध' की स्थिति में हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि आज की महिलाएं डाइट कल्चर और बदलती सुंदरता के मानकों के बीच पली-बढ़ी हैं। 90 के दशक में जहां वजन कम करना मुख्य उद्देश्य था, वहीं आज का जोर 'हमेशा जवां' दिखने और शरीर को 'बायोहैक' करने पर है। ऑस्ट्रेलिया में रहने वाली भारतीय मूल की महिलाओं के लिए यह दबाव और भी जटिल हो जाता है। भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई समुदाय में अक्सर पारिवारिक कार्यक्रमों, शादियों और त्योहारों के दौरान एक खास तरह की 'एवरग्रीन' छवि बनाए रखने का सामाजिक दबाव होता है। यह सिर्फ पश्चिमी सौंदर्य मानकों की बात नहीं है, बल्कि इसमें दक्षिण एशियाई समाज की 'गोरी और जवां' दिखने की पुरानी रूढ़ियां भी शामिल हैं। सिडनी और मेलबर्न जैसे बड़े शहरों में ब्यूटी क्लीनिकों की बाढ़ आ गई है, जो 'एजिंग' को एक बीमारी की तरह दिखाते हैं। मेनोपॉज, जो कभी एक निजी अनुभव माना जाता था, अब एक बड़ा बाजार बन गया है। हालांकि इस बारे में जागरूकता बढ़ना अच्छी बात है, लेकिन आलोचकों का कहना है कि इसका व्यवसायीकरण महिलाओं में यह डर पैदा कर रहा है कि यदि उन्होंने महंगे सप्लीमेंट या ट्रीटमेंट नहीं लिए, तो वे अपनी प्रासंगिकता खो देंगी। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, यह निरंतर दबाव मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव डालता है। कई महिलाएं 'बॉडी डिस्मॉर्फिया' और अत्यधिक तनाव का शिकार हो रही हैं। जब वे उम्र के उन निशानों को नहीं रोक पातीं जो पूरी तरह से प्राकृतिक हैं, तो उनमें आत्म-सम्मान की कमी और असफलता का अहसास होने लगता है। भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई महिलाएं जो पहले से ही दो संस्कृतियों के बीच सामंजस्य बिठाने की कोशिश कर रही हैं, उनके लिए यह 'सुंदरता की दौड़' एक अतिरिक्त वित्तीय और मानसिक बोझ बन गई है। अंततः, यह समझना महत्वपूर्ण है कि बुढ़ापा कोई सुधारने वाली चीज नहीं, बल्कि जीवन का एक पड़ाव है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि हमें 'उम्र को मात देने' के बजाय 'स्वस्थ तरीके से उम्र बढ़ने' (Healthy Ageing) पर ध्यान देना चाहिए। जब तक समाज और बाजार महिलाओं की कीमत केवल उनके लुक्स से आंकना बंद नहीं करेंगे, तब तक यह अदृश्य जंग जारी रहेगी। यह समय है कि हम सौंदर्य के इन अवास्तविक पैमानों को चुनौती दें और अपने शरीर को उसकी प्राकृतिक अवस्था में स्वीकार करना सीखें।
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