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ऑस्ट्रेलियाई रियल एस्टेट में बड़ा बदलाव: 54 प्रतिशत लोग चाहते हैं कि घरों की कीमतें कम हों

ICN24 Newsroom 11 जुल॰ 2026, 07:31 am
ऑस्ट्रेलियाई रियल एस्टेट में बड़ा बदलाव: 54 प्रतिशत लोग चाहते हैं कि घरों की कीमतें कम हों

एक नए सर्वे के अनुसार, अधिकांश ऑस्ट्रेलियाई अब बढ़ती कीमतों के बजाय घरों के दामों में गिरावट के पक्ष में हैं, ताकि अगली पीढ़ी के लिए घर खरीदना आसान हो सके।

ऑस्ट्रेलियाई रियल एस्टेट बाजार में लंबे समय से यह माना जाता रहा है कि घर की कीमतों का बढ़ना अर्थव्यवस्था और संपत्ति मालिकों के लिए हमेशा अच्छी खबर होती है। हालांकि, हालिया सर्वे और बढ़ते आवास संकट ने इस धारणा को पूरी तरह बदल दिया है। रेडब्रिज (RedBridge) द्वारा किए गए एक नए पोल के अनुसार, लगभग 54 प्रतिशत ऑस्ट्रेलियाई अब चाहते हैं कि घरों की कीमतें कम हों। यह आंकड़ा न केवल नीति निर्माताओं के लिए चौंकाने वाला है, बल्कि यह देश के सामाजिक और आर्थिक मिजाज में एक बड़े बदलाव का संकेत भी देता है। भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई समुदाय के लिए यह मुद्दा विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। ऑस्ट्रेलिया में बसने वाले भारतीय प्रवासियों के लिए 'अपना घर' होना एक बड़ी उपलब्धि और सुरक्षा का प्रतीक माना जाता है। लेकिन सिडनी और मेलबर्न जैसे प्रमुख शहरों में घरों की औसत कीमत अब 10 लाख डॉलर के पार जा चुकी है, जिससे नए आने वाले प्रवासियों और यहां तक कि मध्यम वर्ग के लिए भी घर खरीदना एक सपना बनता जा रहा है। इस सर्वे की सबसे दिलचस्प बात यह है कि घर के मालिक भी अब कीमतों में गिरावट का समर्थन कर रहे हैं। आम तौर पर यह माना जाता है कि घर के मालिक अपनी प्रॉपर्टी की वैल्यू बढ़ते देखना चाहते हैं, लेकिन अब प्राथमिकताएं बदल रही हैं। माता-पिता को इस बात की चिंता सता रही है कि उनके बच्चे भविष्य में कहां और कैसे रहेंगे। बढ़ती कीमतों का मतलब है कि अगली पीढ़ी को घर के लिए बहुत अधिक कर्ज लेना होगा या वे बाजार से पूरी तरह बाहर हो जाएंगे। राजनीतिक गलियारों में अक्सर 'प्रॉपर्टी की कीमतों में गिरावट' को एक आपदा की तरह पेश किया जाता है। नेता अक्सर मतदाताओं को डराते हैं कि अगर कीमतें गिरीं, तो उनकी संपत्ति का मूल्य कम हो जाएगा। लेकिन जनता का मूड अब अलग है। लोग अब 'फेयरनेस' यानी निष्पक्षता को अधिक महत्व दे रहे हैं। वे देख रहे हैं कि घर अब रहने की जगह से ज्यादा निवेश का जरिया बन गए हैं, जिससे असमानता बढ़ रही है। भारतीय समुदाय के कई परिवार अब यह महसूस कर रहे हैं कि भले ही उनके अपने घर की कीमत बढ़ गई हो, लेकिन अगर उनके बच्चों को घर खरीदने के लिए भारी भरकम 'बैंक ऑफ मॉम एंड डैड' पर निर्भर रहना पड़ रहा है, तो यह सिस्टम की विफलता है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर सरकारें और राजनीतिक दल इस जनभावना को नहीं समझते हैं, तो आने वाले चुनावों में आवास सामर्थ्य (Housing Affordability) सबसे बड़ा मुद्दा बनकर उभरेगा। निष्कर्ष के रूप में, यह स्पष्ट है कि ऑस्ट्रेलियाई जनता अब केवल अपनी संपत्ति के पोर्टफोलियो को बढ़ते नहीं देखना चाहती, बल्कि वे एक ऐसा समाज चाहते हैं जहां घर खरीदना आम आदमी की पहुंच में हो। गिरती कीमतें अब पैनिक का कारण नहीं, बल्कि एक सकारात्मक सुधार के रूप में देखी जा रही हैं जो समाज के दीर्घकालिक भविष्य के लिए आवश्यक है।
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