राजनीति
RTI कार्यकर्ताओं की सुप्रीम कोर्ट से अपील: अदालती कार्यवाही के क्लिप साझा करने पर लगी पाबंदी की समीक्षा हो
ICN24 Newsroom 31 जुल॰ 2026, 05:36 pm

सूचना के अधिकार (RTI) कार्यकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर अदालती कार्यवाही के वीडियो क्लिप साझा करने पर लगी पूर्ण रोक को हटाने की मांग की है।
सूचना के अधिकार (RTI) के क्षेत्र में सक्रिय प्रमुख कार्यकर्ताओं ने भारत के सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है। 'नेशनल कैंपेन फॉर पीपल्स राइट टू इंफॉर्मेशन' (NCPRI) की को-कन्वीनर अंजलि भारद्वाज और पारदर्शिता कार्यकर्ता अमृता जौहरी द्वारा दायर इस याचिका में अदालती कार्यवाही की लाइव-स्ट्रीमिंग से जुड़े नियमों की समीक्षा की मांग की गई है। मुख्य विवाद 'लाइव-स्ट्रीमिंग और कोर्ट कार्यवाही की रिकॉर्डिंग नियम, 2021' के नियम 6(l) को लेकर है, जो किसी भी व्यक्ति या संस्था को अदालत की अनुमति के बिना कार्यवाही के वीडियो साझा करने, प्रसारित करने या रिकॉर्ड करने से पूरी तरह रोकता है।
याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि लाइव-स्ट्रीमिंग का मूल उद्देश्य न्याय प्रणाली में पारदर्शिता और जवाबदेही लाना था। हालांकि, छोटे क्लिप या वीडियो साझा करने पर पूर्ण प्रतिबंध इस उद्देश्य को विफल करता है। याचिका में कहा गया है कि आम नागरिक, पत्रकार और शोधकर्ता अक्सर पूरी कार्यवाही नहीं देख पाते, ऐसे में कार्यवाही के महत्वपूर्ण अंशों को साझा करना जनहित में है। कार्यकर्ताओं के अनुसार, यह प्रतिबंध न केवल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन है, बल्कि यह जनता के 'जानने के अधिकार' पर भी अंकुश लगाता है।
भारत में अदालती कार्यवाही की लाइव-स्ट्रीमिंग की शुरुआत एक ऐतिहासिक कदम था, जिसका उद्देश्य 'ओपन जस्टिस' (खुला न्याय) की अवधारणा को मजबूत करना था। लेकिन वर्तमान नियमों के तहत, यदि कोई व्यक्ति यूट्यूब या अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से अदालती बहस का कोई छोटा हिस्सा साझा करता है, तो वह कानूनी कार्रवाई के दायरे में आ सकता है। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया है कि जिस तरह अदालती फैसलों और मौखिक टिप्पणियों की रिपोर्टिंग प्रिंट मीडिया में होती है, उसी तरह डिजिटल युग में वीडियो क्लिप्स का प्रसार भी सूचना के प्रवाह का एक स्वाभाविक हिस्सा होना चाहिए।
ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले भारतीय समुदाय के लिए यह खबर विशेष महत्व रखती है। ऑस्ट्रेलिया में भी न्यायिक पारदर्शिता को लेकर डिजिटल सुधार किए गए हैं, जहां विक्टोरिया और न्यू साउथ वेल्स जैसे राज्यों के सुप्रीम कोर्ट विशिष्ट प्रोटोकॉल के तहत लाइव स्ट्रीमिंग की अनुमति देते हैं। प्रवासी भारतीयों के लिए, जो अक्सर भारत की कानूनी और राजनीतिक गतिविधियों में गहरी रुचि रखते हैं, सोशल मीडिया पर इन क्लिप्स का उपलब्ध होना जानकारी का एक महत्वपूर्ण स्रोत है। इस प्रतिबंध की समीक्षा से विदेशों में बैठे भारतीयों को भारत की न्याय प्रणाली को और करीब से समझने का मौका मिलेगा।
याचिका में यह भी सुझाव दिया गया है कि अदालतें पूरी तरह प्रतिबंध लगाने के बजाय एक मध्यम मार्ग अपना सकती हैं। इसमें भ्रामक या संपादित वीडियो (deepfakes) को रोकने के लिए दिशानिर्देश जारी किए जा सकते हैं, लेकिन तथ्यात्मक क्लिप साझा करने की अनुमति दी जानी चाहिए। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि सुप्रीम कोर्ट तकनीकी प्रगति और अदालती मर्यादा के बीच कैसे संतुलन बनाता है। यदि अदालत इस याचिका पर सकारात्मक रुख अपनाती है, तो यह भारत में डिजिटल सूचना के लोकतंत्रीकरण की दिशा में एक बड़ा मील का पत्थर साबित होगा।
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