राजनीति
आरक्षण पर मोहन भागवत का बड़ा बयान: 'अंबेडकर की सलाह मानें तो कोई समस्या नहीं, समर्थ लोग दूसरों को मौका दें'
ICN24 Newsroom 7 अग॰ 2026, 11:37 am

आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने आरक्षण पर डॉ. अंबेडकर के विजन का समर्थन करते हुए इसे वंचितों के उत्थान का माध्यम बताया और राजनीति से बचने की सलाह दी।
नागपुर: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने आरक्षण के संवेदनशील मुद्दे पर एक महत्वपूर्ण बयान देते हुए कहा है कि यदि देश डॉ. बी.आर. अंबेडकर द्वारा दी गई सलाह और उनके विजन का पालन करे, तो आरक्षण को लेकर समाज में कोई विवाद या समस्या उत्पन्न नहीं होगी। भागवत ने स्पष्ट किया कि आरक्षण का उद्देश्य समाज के उन वर्गों का उत्थान करना है जो ऐतिहासिक रूप से पिछड़े रहे हैं, और इसे तब तक जारी रहना चाहिए जब तक कि समानता का लक्ष्य प्राप्त न हो जाए।
एक सार्वजनिक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए भागवत ने इस बात पर जोर दिया कि आरक्षण केवल एक संवैधानिक व्यवस्था नहीं है, बल्कि यह सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने का एक माध्यम है। उन्होंने कहा कि डॉ. अंबेडकर ने स्वयं आरक्षण के लिए कुछ दिशानिर्देश और समयसीमा की परिकल्पना की थी, जिसका उद्देश्य समाज के भीतर समरसता लाना था। भागवत के अनुसार, यदि समाज के वे लोग जो आरक्षण का लाभ उठाकर सशक्त हो चुके हैं, स्वेच्छा से पीछे हटकर दूसरों को अवसर प्रदान करें, तो इसका लाभ उन लोगों तक पहुंचेगा जो वास्तव में आज भी हाशिए पर हैं।
आरएसएस प्रमुख ने राजनीतिक दलों पर भी निशाना साधते हुए कहा कि आरक्षण के मुद्दे को अक्सर राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल किया जाता है, जिससे समाज में विभाजन की स्थिति पैदा होती है। उन्होंने जनता से अपील की कि वे राजनीतिक उकसावे में न आएं और सामाजिक एकता को प्राथमिकता दें। भागवत ने कहा, "आरक्षण तब तक आवश्यक है जब तक समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े व्यक्ति को महसूस न हो कि वह दूसरों के बराबर है। लेकिन इसे राजनीति का हथियार नहीं बनाना चाहिए।"
ऑस्ट्रेलिया में बसे भारतीय समुदाय के लिए भी यह बयान महत्वपूर्ण माना जा रहा है। प्रवासी भारतीयों के बीच अक्सर योग्यता (Merit) और सामाजिक न्याय को लेकर बहस छिड़ी रहती है। भागवत का यह संदेश कि 'लाभ को आगे बढ़ाएं' (pass on the benefits), एक व्यापक सामाजिक जिम्मेदारी की ओर इशारा करता है। प्रवासी समुदाय के कई विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत में सामाजिक स्थिरता और समरसता ही वैश्विक स्तर पर भारतीय सॉफ्ट पावर को मजबूत करती है।
अपने संबोधन के अंत में भागवत ने सामाजिक समरसता की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि भारत को विश्व गुरु बनने के लिए अपने आंतरिक मतभेदों को दूर करना होगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि संघ आरक्षण का विरोधी नहीं है, बल्कि वह इसके सही क्रियान्वयन और बाबा साहब के आदर्शों के अनुरूप इसके संचालन का पक्षधर है। यह बयान ऐसे समय में आया है जब भारत के विभिन्न राज्यों में जाति जनगणना और आरक्षण की सीमा को लेकर राजनीतिक गरमा-गर्मी बढ़ी हुई है।
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