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वेब सीरीज 'अब होगा हिसाब' रिव्यू: पंजाब में 'कबूतरबाजी' और अधूरे सपनों की एक उलझी हुई कहानी

ICN24 Newsroom 20 जून 2026, 01:35 am
वेब सीरीज 'अब होगा हिसाब' रिव्यू: पंजाब में 'कबूतरबाजी' और अधूरे सपनों की एक उलझी हुई कहानी

अमेज़न एमएक्स प्लेयर पर रिलीज हुई 'अब होगा हिसाब' पंजाब से अवैध प्रवासन और मानव तस्करी जैसे गंभीर मुद्दों को उठाती है, लेकिन कहानी की धीमी गति दर्शकों को निराश करती है।

पंजाब की धरती से सात समंदर पार जाने की चाहत और उसके पीछे छिपे 'कबूतरबाजी' के काले खेल पर आधारित नई वेब सीरीज 'अब होगा हिसाब' हाल ही में अमेज़न एमएक्स प्लेयर पर रिलीज हुई है। शाहीर शेख और अविनाश मिश्रा अभिनीत यह सीरीज एक ऐसे विषय को छूती है जो न केवल भारत, बल्कि ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में बसे भारतीय समुदाय के लिए भी बेहद संवेदनशील और प्रासंगिक है। हालांकि, गंभीर सामाजिक मुद्दों और बदले की कहानी के मिश्रण वाली यह सीरीज अपने वादों पर पूरी तरह खरी नहीं उतरती। कहानी का केंद्र बॉबी मनोचा (शाहीर शेख) है, जो कनाडा से डिपोर्ट होने के बाद पंजाब वापस लौटता है। अपनी असफलता और शर्म को छिपाते हुए बॉबी का एकमात्र उद्देश्य अपने छोटे भाई बंटी (अविनाश मिश्रा) को एक बेहतर भविष्य देना है। लेकिन पंजाब के अनगिनत युवाओं की तरह, बंटी भी विदेश जाने को ही सफलता की एकमात्र कुंजी मानता है। इसी होड़ में वह अवैध प्रवासन एजेंटों और मानव तस्करी के खतरनाक जाल में फंस जाता है। यहीं से सीरीज ड्रग्स, राजनीतिक भ्रष्टाचार और अंग तस्करी (ऑर्गन हार्वेस्टिंग) जैसे कई गंभीर धागों को एक साथ पिरोने की कोशिश करती है। ऑस्ट्रेलिया में बसे भारतीय समुदाय, विशेषकर पंजाब से ताल्लुक रखने वाले परिवारों के लिए, यह सीरीज उन खतरों की याद दिलाती है जो 'डंकी रूट' या अवैध तरीकों से विदेश जाने के चक्कर में युवाओं को झेलने पड़ते हैं। सीरीज में दिखाया गया है कि कैसे एक पूरा राज्य प्रवासन की सनक में अपनी जड़ों से कट रहा है। हालांकि, लेखक और निर्देशक इन महत्वपूर्ण पहलुओं पर गहराई से बात करने के बजाय, इन्हें केवल एक सस्पेंस थ्रिलर के प्लॉट पॉइंट्स की तरह इस्तेमाल करते हैं। हर एपिसोड एक बड़े खुलासे की तैयारी जैसा लगता है, लेकिन अंत तक आते-आते दर्शकों को वह संतोषजनक परिणाम नहीं मिलता जिसकी उम्मीद की जा रही थी। अभिनय की बात करें तो शाहीर शेख ने बॉबी के रूप में अपनी भूमिका के साथ न्याय करने की पूरी कोशिश की है। उनके किरदार में एक बड़े भाई की लाचारी और दृढ़ संकल्प साफ झलकता है। अविनाश मिश्रा ने भी एक उतावले युवा के रूप में अच्छा काम किया है। सीरीज में संजय कपूर, मौनी रॉय और हरमन सिंघा जैसे बड़े नाम भी शामिल हैं, लेकिन कमजोर पटकथा के कारण इनके किरदार केवल कैरिकेचर बनकर रह गए हैं। लेखन में गहराई की कमी साफ नजर आती है, जहां भावनाओं को महसूस कराने के बजाय संवादों के माध्यम से केवल जानकारी दी जाती है। कुल मिलाकर, 'अब होगा हिसाब' एक महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट है जो एक साथ कई नावों पर सवार होने की कोशिश करता है। यह एक फैमिली ड्रामा, रिवेंज सागा और सोशल कमेंट्री बनने के चक्कर में किसी भी मोर्चे पर पूरी तरह सफल नहीं हो पाता। यदि आप पंजाब के सामाजिक हालातों और अवैध प्रवासन के वास्तविक संकट पर कुछ ठोस देखना चाहते हैं, तो यह सीरीज आपको निराश कर सकती है। यह केवल एक औसत दर्जे का बदला लेने वाला ड्रामा बनकर रह गई है, जिसमें मुद्दे तो गंभीर हैं लेकिन उनका उपचार काफी सतही है।
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