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सफलता की नई परिभाषा: जब एक दादी के सेवा भाव ने बदल दिया 'आगे बढ़ने' का नजरिया

ICN24 Newsroom 4 जुल॰ 2026, 01:31 am
सफलता की नई परिभाषा: जब एक दादी के सेवा भाव ने बदल दिया 'आगे बढ़ने' का नजरिया

सफलता का अर्थ केवल पद और प्रतिष्ठा नहीं है। रायन जोशुआ महिंदापाला ने अपनी दादी के जीवन से सीखा कि निस्वार्थ सेवा व्यक्तिगत उपलब्धियों से कहीं बड़ी होती है।

आज के प्रतिस्पर्धी युग में, जहाँ सफलता को केवल पदोन्नति, वेतन और सामाजिक प्रतिष्ठा के पैमाने पर मापा जाता है, एक व्यक्तिगत कहानी ने सफलता के इन स्थापित प्रतिमानों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। के बी रायन जोशुआ महिंदापाला ने अपनी दादी के जीवन को याद करते हुए साझा किया है कि कैसे उनके निस्वार्थ सेवा भाव ने उन्हें यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि क्या 'आगे बढ़ना' ही जीवन का एकमात्र उद्देश्य होना चाहिए। यह कहानी विशेष रूप से ऑस्ट्रेलिया में रह रहे भारतीय समुदाय के लिए प्रासंगिक है, जहाँ प्रवासी अक्सर अपनी पहचान बनाने के लिए कड़ी मेहनत और भौतिक उपलब्धियों के बीच संघर्ष करते हैं। रायन जोशुआ महिंदापाला का अनुभव बताता है कि हम एक ऐसे समाज में रहते हैं जो व्यक्तिगत उपलब्धियों को पुरस्कृत करता है। कॉर्पोरेट जगत में हो या सामान्य सामाजिक जीवन में, हमें बचपन से ही 'सफल' होने की दौड़ में शामिल कर दिया जाता है। महिंदापाला स्वीकार करते हैं कि उन्होंने हमेशा यही सोचा था कि जीवन का मुख्य लक्ष्य केवल आगे बढ़ना और ऊंचाइयों को छूना है। हालांकि, उनकी दादी के जीवन के प्रति उनके दृष्टिकोण ने इस धारणा को पूरी तरह बदल दिया। उनकी दादी ने कभी किसी पुरस्कार या पद की लालसा नहीं की, बल्कि उनका पूरा जीवन दूसरों की सेवा और सामुदायिक कल्याण के लिए समर्पित रहा। ऑस्ट्रेलिया में बसे भारतीय और दक्षिण एशियाई समुदायों के लिए यह संघर्ष नया नहीं है। 'मॉडल माइनॉरिटी' कहे जाने वाले इस समुदाय पर अक्सर यह दबाव होता है कि वे आर्थिक और पेशेवर रूप से खुद को साबित करें। इस दौड़ में, अक्सर सामुदायिक सेवा और मानसिक शांति जैसे महत्वपूर्ण पहलू पीछे छूट जाते हैं। महिंदापाला का कहना है कि उनकी दादी की विरासत ने उन्हें यह एहसास दिलाया कि मूर्त लाभ (tangible gains) जैसे कि प्रमोशन या अवार्ड्स, उस संतोष के सामने फीके हैं जो दूसरों की मदद करने से मिलता है। यह कहानी हमें 'सेवा' के उस पारंपरिक भारतीय मूल्य की याद दिलाती है, जो आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में कहीं खोता जा रहा है। प्रवासी भारतीयों के लिए, अपनी जड़ों से जुड़े रहना और अपने पूर्वजों के उन मूल्यों को अपनाना एक बड़ी चुनौती है, जो व्यक्तिवाद के बजाय सामूहिकता को महत्व देते हैं। महिंदापाला के अनुसार, उनकी दादी ने बिना किसी शोर-शराबे के समाज में जो योगदान दिया, वह किसी भी बड़े पद से कहीं अधिक प्रभावशाली था। अंततः, यह लेख हमें आत्म-चिंतन का अवसर देता है। क्या हम केवल अपनी सीवी (CV) को बेहतर बनाने के लिए जी रहे हैं, या हम अपने पीछे एक ऐसी विरासत छोड़ रहे हैं जो दूसरों के जीवन में बदलाव ला सके? महिंदापाला की दादी का जीवन इस बात का प्रमाण है कि असली सफलता वह नहीं है जो दुनिया देख रही है, बल्कि वह है जो समाज की भलाई के लिए चुपचाप की जाती है। यह समय है कि हम सफलता की अपनी परिभाषा को फिर से लिखें और व्यक्तिगत लाभ के ऊपर सामुदायिक सेवा को प्राथमिकता दें।
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