ऑस्ट्रेलिया
ट्रंप की 'डिपोर्टेशन' नीति से बचने की जद्दोजहद: ऑस्ट्रेलिया द्वारा ठुकराए गए शरणार्थी के सामने अब नई चुनौती
ICN24 Newsroom 11 जुल॰ 2026, 09:31 am
ऑस्ट्रेलिया की सख्त शरणार्थी नीति का शिकार हुए एक युवा को अब अमेरिका में ट्रंप प्रशासन की सामूहिक निर्वासन योजना का डर सता रहा है।
कभी ऑस्ट्रेलिया की 'स्टॉप द बोट्स' नीति के कारण समुद्र के बीच मझधार में फंसे शरणार्थियों के लिए अमेरिका एक उम्मीद की किरण बनकर उभरा था, लेकिन अब वही उम्मीद एक नए डर में बदलती दिख रही है। एक युवा शरणार्थी, जिसे सालों पहले ऑस्ट्रेलियाई मुख्य भूमि पर प्रवेश देने से मना कर दिया गया था, अब अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के आगामी प्रशासन की सख्त प्रवासन नीतियों से बचने के लिए संघर्ष कर रहा है।
यह मामला उन सैकड़ों शरणार्थियों की स्थिति को उजागर करता है जिन्हें ओबामा प्रशासन के दौरान ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका के बीच हुए एक समझौते के तहत अमेरिका में बसाया गया था। वर्तमान में एक अस्थायी छात्र वीजा (Temporary Student Visa) पर रह रहे इस युवा के लिए समय तेजी से बीत रहा है। ट्रंप के 'ऑपरेशन औरोरा' और देश के इतिहास में सबसे बड़े सामूहिक निर्वासन के वादे ने इस समुदाय में हड़कंप मचा दिया है।
ऑस्ट्रेलिया की विवादित 'ऑफशोर प्रोसेसिंग' नीति के तहत कई शरणार्थियों को नौरू और मानुस द्वीप के केंद्रों में रखा गया था। वहां से कई को अमेरिका भेजा गया, इस उम्मीद के साथ कि वे वहां एक नया जीवन शुरू कर सकेंगे। हालांकि, छात्र वीजा जैसी अस्थायी व्यवस्थाएं उन्हें वह सुरक्षा प्रदान नहीं करतीं जो एक स्थायी नागरिकता या ग्रीन कार्ड दे सकता है। अब जैसे-जैसे ट्रंप प्रशासन की वापसी की तैयारी हो रही है, इन लोगों के पास कानूनी विकल्प सीमित होते जा रहे हैं।
भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई समुदाय के लिए यह खबर महत्वपूर्ण है क्योंकि यह वैश्विक प्रवासन नीतियों की अनिश्चितता को दर्शाती है। ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले कई प्रवासी, जो स्वयं वीजा की जटिल प्रक्रियाओं से गुजरते हैं, इस बात को बखूबी समझते हैं कि राजनीतिक बदलाव किस तरह व्यक्तिगत जीवन को प्रभावित कर सकते हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि इन शरणार्थियों को वापस भेजा जाता है, तो उनके पास जाने के लिए कोई सुरक्षित स्थान नहीं होगा, क्योंकि ऑस्ट्रेलिया उन्हें वापस लेने से पहले ही इनकार कर चुका है।
वर्तमान में, यह छात्र अपनी पढ़ाई पूरी करने और किसी तरह कानूनी सुरक्षा हासिल करने की कोशिश कर रहा है। उसका कहना है कि वह केवल एक सामान्य जीवन जीना चाहता है, लेकिन राजनीतिक मजबूरियां उसे फिर से उसी अनिश्चितता की ओर धकेल रही हैं जहां से उसने शुरुआत की थी। यह देखना बाकी है कि क्या अमेरिकी कानूनी प्रणाली इन मानवीय आधारों पर कोई राहत प्रदान करेगी या ट्रंप की 'जीरो टॉलरेंस' नीति इन सपनों को चकनाचूर कर देगी।
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