ऑस्ट्रेलिया
'पुरानी शराब, नई बोतल': डीपफेक वीडियो के बढ़ते खतरों पर कार्यकर्ताओं ने जताई चिंता
ICN24 Newsroom 20 जून 2026, 08:24 pm
पश्चिम पापुआ के कार्यकर्ताओं को निशाना बनाने वाले एआई-जनित डीपफेक वीडियो ने 'डिजिटल उपनिवेशवाद' और भ्रामक सूचनाओं के बढ़ते खतरे पर एक नई बहस छेड़ दी है।
सूचना प्रौद्योगिकी के इस दौर में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) का दुरुपयोग एक नई और गंभीर चुनौती बनकर उभरा है। हाल ही में पश्चिम पापुआ के मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को निशाना बनाने वाले एआई-जनित 'डीपफेक' वीडियो की एक श्रृंखला ने विशेषज्ञों और नागरिक समाज के बीच खतरे की घंटी बजा दी है। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने इसे 'पुरानी शराब, नई बोतल' करार दिया है, जिसका अर्थ है कि दुष्प्रचार और प्रोपेगेंडा की पुरानी तरकीबों को अब एआई जैसे आधुनिक और परिष्कृत हथियारों के माध्यम से अंजाम दिया जा रहा है।
इन डीपफेक वीडियो में प्रमुख कार्यकर्ताओं के चेहरों और आवाजों का इस्तेमाल कर उन्हें ऐसी बातें कहते हुए दिखाया गया है, जो उन्होंने कभी नहीं कहीं। विशेषज्ञों का कहना है कि यह केवल तकनीकी धोखाधड़ी नहीं है, बल्कि 'डिजिटल उपनिवेशवाद' का एक रूप है। इसके माध्यम से हाशिए पर रहने वाले समुदायों की आवाज को दबाने और उनकी वास्तविक मांगों को भ्रमित करने का प्रयास किया जा रहा है। पश्चिम पापुआ के संदर्भ में, जहाँ दशकों से राजनीतिक और सामाजिक संघर्ष चल रहा है, वहां इस तरह के वीडियो क्षेत्रीय स्थिरता और मानवाधिकारों की लड़ाई को गंभीर नुकसान पहुँचा सकते हैं।
ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले भारतीय समुदाय के लिए भी यह मुद्दा अत्यधिक प्रासंगिक है। ऑस्ट्रेलिया एक बहुसांस्कृतिक समाज है जहाँ सूचनाओं का आदान-प्रदान तेजी से होता है। भारतीय मूल के प्रवासी अक्सर व्हाट्सएप और फेसबुक जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का व्यापक उपयोग करते हैं, जहाँ भ्रामक सामग्री या 'फेक न्यूज' तेजी से फैलती है। विशेषज्ञों का मानना है कि जो तकनीक आज पश्चिम पापुआ के कार्यकर्ताओं के खिलाफ इस्तेमाल हो रही है, उसका उपयोग कल किसी भी समुदाय, राजनीतिक दल या व्यक्ति के चरित्र हनन के लिए किया जा सकता है।
साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, डीपफेक तकनीक अब इतनी सुलभ हो गई है कि कोई भी मामूली जानकारी रखने वाला व्यक्ति उच्च गुणवत्ता वाले फर्जी वीडियो बना सकता है। पहले प्रोपेगेंडा फैलाने के लिए बड़े संसाधनों की आवश्यकता होती थी, लेकिन अब केवल एक सॉफ्टवेयर के जरिए किसी की भी प्रतिष्ठा धूमिल की जा सकती है। कार्यकर्ताओं का कहना है कि सरकारों और तकनीकी कंपनियों को इसके खिलाफ सख्त कानून और पहचान प्रणाली विकसित करने की आवश्यकता है।
अंततः, यह संकट केवल तकनीक का नहीं, बल्कि नैतिकता का भी है। डिजिटल साक्षरता को बढ़ावा देना अब समय की मांग है ताकि नागरिक असली और नकली वीडियो के बीच अंतर कर सकें। जब तक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म अपनी जिम्मेदारी नहीं समझेंगे और एल्गोरिदम में सुधार नहीं करेंगे, तब तक 'डिजिटल उपनिवेशवाद' का यह खतरा लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए एक बड़ी चुनौती बना रहेगा। ऑस्ट्रेलिया में सक्रिय भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई संस्थाओं को भी इस दिशा में जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता है ताकि समुदाय को ऐसे डिजिटल हमलों से सुरक्षित रखा जा सके।
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