राजनीति
ओडिशा सरकार की बड़ी कार्रवाई: कंधमाल दंगा जांच का डेटा डिलीट, जस्टिस नायडू के पास सुरक्षित हैं मुख्य दस्तावेज
ICN24 Newsroom 4 अग॰ 2026, 06:37 am

ओडिशा सरकार 2008 के कंधमाल दंगों से जुड़ी जांच रिपोर्ट के डिलीट हुए डिजिटल डेटा को रिकवर करने में जुटी है, जबकि जस्टिस नायडू के पास मूल दस्तावेज सुरक्षित हैं।
ओडिशा की राजनीति में एक बड़ा प्रशासनिक और कानूनी घटनाक्रम सामने आया है। राज्य सरकार मुख्यमंत्री कार्यालय (CMO) के कंप्यूटरों से गायब हुए महत्वपूर्ण जांच दस्तावेजों को फिर से प्राप्त करने के लिए तकनीकी विशेषज्ञों की मदद ले रही है। यह मामला 2008 के कंधमाल दंगों और स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती की हत्या की जांच से जुड़ा है। राजस्व मंत्री सुरेश पुजारी ने पुष्टि की है कि कंधमाल जांच आयोग द्वारा उपयोग किए गए कंप्यूटरों से डेटा डिलीट कर दिया गया था, जिसे अब रिकवर करने के प्रयास किए जा रहे हैं।
मंत्री सुरेश पुजारी के अनुसार, सरकार को पता चला है कि आयोग की रिपोर्ट के डिजिटल अंश गायब हैं। हालांकि, एक राहत की बात यह है कि जांच आयोग के अध्यक्ष, न्यायमूर्ति ए.एस. नायडू के पास इस पूरी जांच की मूल पांडुलिपियां (manuscripts) सुरक्षित हैं। सरकार अब इन भौतिक दस्तावेजों के आधार पर रिकॉर्ड को फिर से तैयार करने और गायब हुए डिजिटल डेटा की जवाबदेही तय करने की प्रक्रिया में है।
यह घटनाक्रम ओडिशा में सत्ता परिवर्तन के बाद आया है, जहां नई सरकार पिछली सरकार के समय की अधूरी या संदिग्ध फाइलों की समीक्षा कर रही है। 2008 में स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती की हत्या के बाद कंधमाल में भीषण सांप्रदायिक हिंसा भड़क गई थी, जिसने न केवल भारत बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बटोरी थीं। ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले भारतीय समुदाय, विशेष रूप से ओड़िया प्रवासियों के लिए यह खबर अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि वे लंबे समय से इस मामले में न्याय और पारदर्शिता की मांग करते रहे हैं। सिडनी और मेलबर्न जैसे शहरों में सक्रिय ओड़िया संगठन अक्सर भारत में कानून व्यवस्था और ऐतिहासिक जांचों की प्रगति पर चर्चा करते हैं।
राजस्व मंत्री ने स्पष्ट किया कि तकनीकी टीमें फॉरेंसिक आधार पर डेटा रिकवरी का प्रयास कर रही हैं। उन्होंने कहा कि यदि डेटा जानबूझकर मिटाया गया है, तो इसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। सरकार का लक्ष्य इस रिपोर्ट को पूरी पारदर्शिता के साथ राज्य विधानसभा के पटल पर रखना है।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि न्यायमूर्ति नायडू के पास मौजूद हस्तलिखित दस्तावेज इस मामले में सबसे पुख्ता सबूत हैं। यदि डिजिटल डेटा पूरी तरह रिकवर नहीं भी होता है, तो भी इन पांडुलिपियों के जरिए रिपोर्ट को पुनर्जीवित किया जा सकता है। यह मामला न केवल प्रशासनिक लापरवाही को दर्शाता है, बल्कि यह भी संकेत देता है कि संवेदनशील मामलों की फाइलों के रखरखाव में कितनी बड़ी चूक हुई है। ऑस्ट्रेलिया में बसे भारतीय विशेषज्ञ अक्सर डिजिटल गवर्नेंस की बात करते हैं, ऐसे में ओडिशा की यह घटना डेटा सुरक्षा और सरकारी रिकॉर्ड के संरक्षण पर नए सवाल खड़े करती है।
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