राजनीति
'भ्रष्टाचार में कभी लिप्त नहीं रहा': बंगाल के पूर्व उपाध्यक्ष का सुसाइड नोट, परिवार को दी राजनीति से दूर रहने की सलाह
ICN24 Newsroom 16 अग॰ 2026, 06:37 pm

पश्चिम बंगाल के पूर्व उपाध्यक्ष ने अपने सुसाइड नोट में भ्रष्टाचार के आरोपों को नकारते हुए परिवार को राजनीति से बचने की नसीहत दी है।
पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बार फिर हड़कंप मच गया है। राज्य विधानसभा के एक पूर्व उपाध्यक्ष द्वारा कथित तौर पर लिखे गए सुसाइड नोट ने प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक पन्ने के इस बंगाली नोट में, जो उनकी मृत्यु के बाद बरामद हुआ, उन्होंने स्पष्ट रूप से अपनी सत्यनिष्ठा का दावा किया है और राजनीति की वर्तमान स्थिति पर निराशा व्यक्त की है।
रिपोर्ट्स के अनुसार, इस सुसाइड नोट में पूर्व उपाध्यक्ष ने साफ तौर पर लिखा है कि वह अपने पूरे सार्वजनिक जीवन के दौरान 'कभी भी भ्रष्टाचार में शामिल नहीं रहे'। उन्होंने अपनी छवि और ईमानदारी को लेकर उठे किसी भी संभावित सवाल को खारिज करते हुए खुद को निर्दोष बताया। यह बयान ऐसे समय में आया है जब पश्चिम बंगाल में भ्रष्टाचार के विभिन्न मामलों को लेकर केंद्रीय एजेंसियां और राज्य की राजनीति काफी सक्रिय हैं। हालांकि, नोट में उन्होंने अपनी मृत्यु के लिए किसी भी व्यक्ति या संस्था को जिम्मेदार नहीं ठहराया है।
सुसाइड नोट का सबसे चौंकाने वाला हिस्सा वह है जहां उन्होंने अपने परिवार के सदस्यों को एक विशेष नसीहत दी है। उन्होंने अपनी अगली पीढ़ी और परिवार को सक्रिय राजनीति से पूरी तरह दूर रहने की सलाह दी। नोट के अनुसार, उन्होंने राजनीति के मौजूदा स्वरूप और इसमें आने वाली चुनौतियों को अपने परिवार के लिए उचित नहीं माना। यह नसीहत उस व्यक्ति की ओर से आई है जिसने दशकों तक राज्य की विधायी प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, जो भारतीय लोकतंत्र में एक गहरी विडंबना को दर्शाता है।
ऑस्ट्रेलिया में रह रहे भारतीय समुदाय के लिए भारत की राज्य स्तरीय राजनीति हमेशा से चर्चा का विषय रही है। विशेषकर पश्चिम बंगाल के प्रवासियों के लिए, सार्वजनिक जीवन में शुचिता और ईमानदारी का यह मुद्दा अत्यंत संवेदनशील है। सिडनी और मेलबर्न जैसे शहरों में बसे बंगाली समुदाय के बीच इस घटना को लेकर गहरी चिंता देखी जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की घटनाएं सार्वजनिक सेवा में लगे लोगों पर बढ़ते मानसिक दबाव और राजनीतिक शुचिता के गिरते स्तर की ओर संकेत करती हैं।
पुलिस प्रशासन ने इस मामले की जांच शुरू कर दी है और सुसाइड नोट की प्रामाणिकता की पुष्टि के लिए उसे फॉरेंसिक जांच के लिए भेज दिया गया है। फिलहाल, इस घटना ने न केवल राज्य की सत्तारूढ़ पार्टी बल्कि विपक्ष के लिए भी एक आत्ममंथन का अवसर पैदा कर दिया है। क्या सार्वजनिक जीवन अब इतना बोझिल हो गया है कि अनुभवी नेता भी इसे अपने परिवार के लिए सुरक्षित नहीं मानते? यह एक ऐसा सवाल है जिसका उत्तर आने वाले समय में भारतीय राजनीति को देना होगा।
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