राजनीति
नाटो का अगला अध्याय: क्या यूरोप थामेगा अपनी सुरक्षा की कमान?
ICN24 Newsroom 8 जुल॰ 2026, 07:31 am
तुर्की में होने वाले नाटो शिखर सम्मेलन में गठबंधन के नए मॉडल पर चर्चा होगी, क्योंकि अमेरिका अब सुरक्षा की मुख्य जिम्मेदारी यूरोप को सौंपने की तैयारी में है।
तुर्की में इस सप्ताह आयोजित हो रहा नाटो (NATO) शिखर सम्मेलन केवल एक नियमित बैठक नहीं है, बल्कि यह इस सैन्य गठबंधन के भविष्य को नई दिशा देने वाला एक निर्णायक मोड़ साबित हो सकता है। इस सम्मेलन का मुख्य केंद्र बिंदु एक ऐसे नए मॉडल का निर्माण करना है, जहाँ यूरोप अपनी रक्षा और सुरक्षा के लिए अग्रणी भूमिका निभा सके। यह बदलाव तब और भी महत्वपूर्ण हो जाता है जब अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का 'अमेरिका फर्स्ट' (America First) दृष्टिकोण फिर से चर्चा में है, जो अन्य देशों पर अपना रक्षा खर्च बढ़ाने और अमेरिका पर निर्भरता कम करने के लिए दबाव बना रहा है।
दशकों से, नाटो की सुरक्षा छतरी मुख्य रूप से अमेरिकी सैन्य शक्ति और वित्त पोषण पर टिकी रही है। हालांकि, बदलते वैश्विक परिदृश्य और अमेरिकी राजनीति में आंतरिक बदलावों ने अब यूरोपीय देशों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या वे अमेरिका के बिना अपनी सीमाओं की रक्षा करने में सक्षम हैं। तुर्की, जो स्वयं नाटो का एक महत्वपूर्ण और रणनीतिक सदस्य है, इस चर्चा के लिए एक पुल की भूमिका निभा रहा है। यहाँ हो रही चर्चाओं का असर केवल यूरोप तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका प्रभाव वैश्विक सुरक्षा संरचना पर भी पड़ेगा।
भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई समुदाय के लिए, नाटो के भीतर यह बदलाव विशेष रूप से प्रासंगिक है। ऑस्ट्रेलिया, नाटो का एक प्रमुख साझेदार (Partner across the globe) है, और वैश्विक सुरक्षा में किसी भी प्रकार का असंतुलन प्रशांत क्षेत्र (Indo-Pacific) की स्थिरता को प्रभावित करता है। यदि अमेरिका अपना ध्यान यूरोप से हटाकर रक्षा खर्च में कटौती करता है, तो इसका सीधा असर क्वाड (QUAD) और ऑकस (AUKUS) जैसे गठबंधनों पर पड़ सकता है, जिनमें भारत और ऑस्ट्रेलिया सक्रिय भागीदार हैं। मेलबर्न और सिडनी में बसे भारतीय मूल के पेशेवरों और विश्लेषकों का मानना है कि एक आत्मनिर्भर यूरोप वैश्विक स्तर पर शांति बनाए रखने में मदद कर सकता है, लेकिन इस संक्रमण काल में पैदा होने वाली अनिश्चितता चिंता का विषय है।
यूरोपीय देशों के सामने सबसे बड़ी चुनौती वित्तीय और सैन्य तालमेल की है। जहाँ पोलैंड और बाल्टिक देश रक्षा बजट बढ़ाने के पक्ष में हैं, वहीं जर्मनी और फ्रांस जैसे बड़े देशों को अपनी घरेलू आर्थिक चुनौतियों और सैन्य आधुनिकीकरण के बीच संतुलन बनाना होगा। ट्रंप की आपत्तियों का मूल कारण यही रहा है कि अमेरिका नाटो के कुल खर्च का एक बड़ा हिस्सा वहन करता है, जबकि कई यूरोपीय देश निर्धारित लक्ष्य तक भी नहीं पहुँच पाते।
अंततः, तुर्की का यह शिखर सम्मेलन नाटो की एकजुटता की परीक्षा लेगा। क्या यूरोप एक स्वर में बात कर पाएगा? क्या वह अपनी सुरक्षा के लिए आवश्यक संसाधन जुटा पाएगा? ये ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब न केवल यूक्रेन संकट के समाधान के लिए जरूरी है, बल्कि यह आने वाले दशकों में वैश्विक भू-राजनीति की दिशा भी तय करेगा। भारत और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों के लिए, जो एक बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के पक्षधर हैं, नाटो का यह 'नया अवतार' रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण होगा।
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