राजनीति
पालमपेट शिव मंदिर परिसर की एक और ऐतिहासिक संरचना को मिला राष्ट्रीय संरक्षण का दर्जा
ICN24 Newsroom 7 जुल॰ 2026, 10:31 pm

मुलुगु जिले के पालमपेट में यूनेस्को विश्व धरोहर रामप्पा मंदिर के निकट स्थित एक अन्य ऐतिहासिक संरचना को अब राष्ट्रीय स्तर का संरक्षण प्रदान किया गया है।
तेलंगाना के मुलुगु जिले के लिए एक बड़ी उपलब्धि में, केंद्र सरकार ने पालमपेट स्थित ऐतिहासिक रामप्पा मंदिर के पास स्थित एक और प्राचीन संरचना को राष्ट्रीय महत्व का दर्जा देते हुए इसे आधिकारिक संरक्षण प्रदान किया है। वेंकटपुर मंडल के पालमपेट गांव में स्थित यह संरचना लंबे समय से पुरातत्वविदों और इतिहास प्रेमियों के आकर्षण का केंद्र रही है। अब राष्ट्रीय स्तर का संरक्षण मिलने से इस क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत को संजोने के प्रयासों को नई मजबूती मिलेगी।
यह निर्णय ऐसे समय में आया है जब भारत अपनी प्राचीन धरोहरों को वैश्विक मंच पर स्थापित करने के लिए सक्रिय रूप से काम कर रहा है। रामप्पा मंदिर, जिसे पहले ही यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल का दर्जा मिल चुका है, अपनी अद्वितीय वास्तुकला और 'फ्लोटिंग ब्रिक्स' (तैरने वाली ईंटों) के लिए विश्व प्रसिद्ध है। नई संरचना को मिला यह संरक्षण दर्जा न केवल इस विशिष्ट स्थल की सुरक्षा सुनिश्चित करेगा, बल्कि काकतीय राजवंश की इंजीनियरिंग विशेषज्ञता को भी दुनिया के सामने नए सिरे से पेश करेगा।
भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई समुदाय के लिए, विशेष रूप से वे जो तेलंगाना और आंध्र प्रदेश से संबंध रखते हैं, यह खबर अत्यंत गौरवपूर्ण है। ऑस्ट्रेलिया में बसे भारतीय मूल के लोग अक्सर अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ाव महसूस करते हैं और भारत की ऐतिहासिक संपत्तियों का वैश्विक स्तर पर मान्यता पाना उनके लिए एक भावनात्मक विषय होता है। सिडनी, मेलबर्न और पर्थ जैसे शहरों में रहने वाले प्रवासी भारतीयों के लिए यह स्थल अब भारत यात्रा के दौरान एक प्रमुख गंतव्य के रूप में उभरेगा, जिससे सांस्कृतिक पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा।
राजनीतिक और प्रशासनिक दृष्टिकोण से देखें तो यह कदम केंद्र और राज्य सरकार के बीच समन्वय का परिणाम माना जा रहा है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) अब इस संरचना के रखरखाव, जीर्णोद्धार और सुरक्षा की सीधी जिम्मेदारी संभालेगा। इससे पहले, स्थानीय स्तर पर इन संरचनाओं के संरक्षण को लेकर चिंताएं जताई जाती रही थीं। विशेषज्ञों का मानना है कि इस कदम से पालमपेट और आसपास के क्षेत्रों में पर्यटन बुनियादी ढांचे का विकास होगा, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी लाभ होगा।
काकतीय काल की यह वास्तुकला अपनी सूक्ष्म नक्काशी और रेत-बॉक्स (sand-box) तकनीक के लिए जानी जाती है, जिसने इन मंदिरों को सदियों से आए भूकंपों से बचाए रखा है। राष्ट्रीय संरक्षण मिलने के बाद, अब यह उम्मीद की जा रही है कि इस स्थल पर वैज्ञानिक शोध और खुदाई के नए अवसर खुलेंगे, जिससे मध्यकालीन भारत के इतिहास की कई और अनकही कहानियां सामने आ सकेंगी। यह न केवल इतिहास के छात्रों के लिए बल्कि उन प्रवासी भारतीयों के लिए भी महत्वपूर्ण है जो अपनी अगली पीढ़ी को अपनी समृद्ध विरासत से परिचित कराना चाहते हैं।
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