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राष्ट्रीय पहचान का संकट: जब देश अपनी बुनियाद और अस्तित्व को लेकर असुरक्षित महसूस करने लगें
ICN24 Newsroom 5 जून 2026, 05:30 pm

वैश्विक राजनीति में बढ़ती उथल-पुथल के बीच विशेषज्ञ देशों की 'ओन्टोलॉजिकल सुरक्षा' पर चिंता जता रहे हैं, जो ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों के भविष्य को प्रभावित कर सकता है।
आज की वैश्विक राजनीति केवल रणनीतिक गणनाओं का खेल नहीं रह गई है, बल्कि यह एक गहरे मनोवैज्ञानिक संकट से गुजर रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि रूस और अमेरिका जैसे शक्तिशाली देश 'ओन्टोलॉजिकल असुरक्षा' (Ontological Insecurity) का सामना कर रहे हैं—यानी एक ऐसी स्थिति जहां किसी राष्ट्र को अपने अस्तित्व, उद्देश्य और दुनिया में अपनी जगह को लेकर संदेह होने लगता है। यह मानसिक स्थिति न केवल अंतरराष्ट्रीय संबंधों को खतरनाक बना रही है, बल्कि ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड जैसे देशों के लिए भी नई चुनौतियां पेश कर रही है।
'ओन्टोलॉजिकल सिक्योरिटी' शब्द मूल रूप से मनोरोग विज्ञान (Psychiatry) से आया है। जिस तरह एक स्वस्थ व्यक्ति अपनी पहचान को लेकर आश्वस्त रहता है, उसी तरह एक स्थिर राष्ट्र को भी अपनी निरंतरता और व्यवस्था का अहसास होना जरूरी है। जब किसी देश की पुरानी कहानियां और उसकी वैश्विक छवि टूटने लगती है, तो वह देश अपनी पहचान को सुरक्षित करने के लिए आक्रामक कदम उठाने लगता है। रूस इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। सोवियत संघ के पतन के बाद रूस ने अपनी खोई हुई पहचान वापस पाने की कोशिश की, जिसका परिणाम अंततः यूक्रेन पर आक्रमण के रूप में सामने आया। राष्ट्रपति पुतिन के लिए यूक्रेन का पश्चिम की ओर झुकाव केवल एक राजनीतिक समस्या नहीं, बल्कि रूसी पहचान पर एक सीधा प्रहार था।
दूसरी ओर, संयुक्त राज्य अमेरिका भी इसी तरह के संकट से जूझ रहा है। शीत युद्ध के बाद अमेरिका का यह मानना था कि वह पूरी दुनिया को अपने लोकतांत्रिक सांचे में ढाल सकता है। हालांकि, अफगानिस्तान और इराक में विफल हस्तक्षेपों ने इस भरोसे को तोड़ दिया। डोनाल्ड ट्रंप का 'अमेरिका फर्स्ट' नारा इसी असुरक्षा का परिणाम है, जहां देश वैश्विक जिम्मेदारियों से पीछे हटकर अपनी पुरानी, सरल पहचान को फिर से पाने की कोशिश कर रहा है।
ऑस्ट्रेलिया के लिए यह स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक है। पिछले 75 वर्षों से ऑस्ट्रेलिया ने अपनी सुरक्षा के लिए अमेरिका पर भरोसा किया है। लेकिन अब, जब अमेरिका खुद अपनी भूमिका को लेकर असमंजस में है, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड जैसे 'मध्यम शक्तियों' (Middle Powers) को अपनी रणनीति पर फिर से विचार करना होगा। ऑस्ट्रेलिया के भीतर भी बढ़ती महंगाई, प्रवासन (Migration) को लेकर सामाजिक अशांति और सरकार के प्रति गिरते भरोसे ने एक आंतरिक पहचान संकट पैदा किया है। सोशल मीडिया और एआई जैसी तकनीकें उन साझा कहानियों को कमजोर कर रही हैं जो एक राष्ट्र को एकजुट रखती हैं।
विशेषज्ञों का सुझाव है कि इस अस्थिरता का समाधान 'मध्यम शक्तियों' के गठबंधन में हो सकता है। ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों को अब केवल महाशक्तियों के भरोसे रहने के बजाय अपनी खुद की पहचान और मूल्यों को स्पष्ट करना होगा। एक ऐसी दुनिया में जहां बड़े देश अपनी असुरक्षा के कारण संघर्ष की ओर बढ़ रहे हैं, ऑस्ट्रेलिया जैसे देश अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को स्थिरता प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं, बशर्ते वे अपनी आंतरिक एकता और 'अस्तित्वगत सुरक्षा' को मजबूत करें।
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