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नगालैंड चर्च काउंसिल ने 'वंदे मातरम' की अनिवार्यता का किया विरोध, धार्मिक स्वतंत्रता का दिया हवाला

ICN24 Newsroom 14 अग॰ 2026, 08:39 pm
नगालैंड चर्च काउंसिल ने 'वंदे मातरम' की अनिवार्यता का किया विरोध, धार्मिक स्वतंत्रता का दिया हवाला

नगालैंड बैपटिस्ट चर्च काउंसिल (NBCC) ने 'वंदे मातरम' को अनिवार्य बनाने के किसी भी प्रयास का विरोध करते हुए इसे धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन बताया है।

नगालैंड की प्रमुख ईसाई संस्था, नगालैंड बैपटिस्ट चर्च काउंसिल (NBCC) ने स्कूलों और शैक्षणिक संस्थानों में राष्ट्रीय गीत 'वंदे मातरम' के गायन को अनिवार्य बनाने के किसी भी संभावित कदम का कड़ा विरोध किया है। काउंसिल ने स्पष्ट किया है कि देशभक्ति को किसी विशेष गीत या नारे के माध्यम से थोपा नहीं जाना चाहिए, विशेष रूप से तब जब वह किसी समुदाय की धार्मिक मान्यताओं के साथ विरोधाभास पैदा करता हो। NBCC के अनुसार, 'वंदे मातरम' में मातृभूमि को एक देवी के रूप में संबोधित किया गया है, जो ईसाई धर्म की एकेश्वरवादी (एक ईश्वर में विश्वास) मान्यताओं के अनुरूप नहीं है। परिषद का तर्क है कि उनके धर्म में केवल ईश्वर की आराधना का प्रावधान है, और किसी भी अन्य सत्ता या प्रतीक को पूजनीय मानना उनके धार्मिक सिद्धांतों के खिलाफ है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि गीत का विरोध देश के प्रति अनादर नहीं है, बल्कि अपनी धार्मिक पहचान को अक्षुण्ण बनाए रखने की एक संवैधानिक मांग है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 का हवाला देते हुए चर्च काउंसिल ने कहा कि देश के प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म को मानने और उसके अनुसार आचरण करने का मौलिक अधिकार है। परिषद ने सरकार और संबंधित अधिकारियों से आग्रह किया है कि वे ऐसे निर्णयों से बचें जो अल्पसंख्यकों की धार्मिक संवेदनशीलता को प्रभावित करते हों। नगालैंड, जो कि एक ईसाई बहुल राज्य है, वहां इस तरह के सांस्कृतिक और धार्मिक मुद्दे अक्सर राजनीतिक विमर्श का केंद्र बन जाते हैं। यह विवाद केवल नगालैंड तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत के विभिन्न हिस्सों में समय-समय पर 'वंदे मातरम' की अनिवार्यता को लेकर बहस होती रही है। आलोचकों का मानना है कि राष्ट्रवाद के प्रतीकों को अनिवार्य बनाना विविधतापूर्ण समाज में विभाजन पैदा कर सकता है। दूसरी ओर, समर्थकों का कहना है कि यह गीत स्वतंत्रता संग्राम का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है और इसे राष्ट्र की एकता के प्रतीक के रूप में देखा जाना चाहिए। ऑस्ट्रेलिया में रह रहे भारतीय समुदाय, विशेष रूप से पूर्वोत्तर भारत के प्रवासियों के लिए यह मुद्दा काफी संवेदनशील है। मेलबर्न और सिडनी जैसे शहरों में बसे नगा समुदाय के लोग इन घटनाक्रमों को भारत में धर्मनिरपेक्षता और भाषाई-सांस्कृतिक पहचान के संरक्षण के रूप में देखते हैं। प्रवासी भारतीयों के बीच यह चर्चा अक्सर होती है कि कैसे एक आधुनिक लोकतंत्र में व्यक्तिगत स्वतंत्रता और राष्ट्रीय प्रतीकों के बीच संतुलन बनाया जाए। NBCC ने अपने बयान के अंत में कहा कि वे भारत के प्रति पूरी तरह वफादार हैं और देश की प्रगति में उनका योगदान हमेशा रहेगा। हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि राष्ट्रवाद हृदय से उपजना चाहिए और इसे किसी कानूनी अनिवार्यता के तहत जबरन लागू नहीं किया जा सकता। परिषद ने अपील की है कि भारत की 'विविधता में एकता' की भावना को बनाए रखने के लिए सभी समुदायों की मान्यताओं का सम्मान किया जाना चाहिए।
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