राजनीति
'काफिरों से दोस्ती न करें मुसलमान': भारत-अफगान संबंधों पर पाकिस्तान ने दिया कुरान का हवाला
ICN24 Newsroom 3 अग॰ 2026, 03:37 am

पाकिस्तान ने भारत और अफगानिस्तान के बढ़ते कूटनीतिक संबंधों पर आपत्ति जताते हुए धार्मिक संदर्भों का इस्तेमाल किया है, जिससे क्षेत्रीय तनाव बढ़ने की आशंका है।
इस्लामाबाद और काबुल के बीच बढ़ते तनाव के बीच पाकिस्तान ने अब भारत और अफगानिस्तान के मजबूत होते द्विपक्षीय संबंधों को निशाना बनाने के लिए धार्मिक बयानबाजी का सहारा लिया है। हालिया रिपोर्टों के अनुसार, पाकिस्तान के कुछ प्रमुख हलकों और धार्मिक-राजनीतिक नेतृत्व ने कुरान की आयतों का हवाला देते हुए यह तर्क दिया है कि 'मुसलमानों को काफिरों (गैर-मुस्लिमों) के साथ घनिष्ठ मित्रता नहीं करनी चाहिए।' यह बयान स्पष्ट रूप से भारत और अफगानिस्तान के बीच बढ़ती नजदीकी को रोकने के उद्देश्य से दिया गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान की यह प्रतिक्रिया उसकी उस पुरानी 'सामरिक गहराई' (Strategic Depth) की नीति का हिस्सा है, जिसके तहत वह अफगानिस्तान को अपने प्रभाव क्षेत्र में रखना चाहता है। अगस्त 2021 में तालिबान के सत्ता में आने के बाद से भारत ने अफगानिस्तान के साथ अपने संबंधों को बहुत ही सधे हुए अंदाज में आगे बढ़ाया है। भारत ने वहां न केवल मानवीय सहायता भेजी है, बल्कि काबुल में अपने तकनीकी मिशन को भी फिर से सक्रिय किया है। भारत की इस 'सॉफ्ट पावर' कूटनीति ने पाकिस्तान की चिंताएं बढ़ा दी हैं।
पाकिस्तान का यह रुख ऐसे समय में आया है जब डूरंड रेखा पर सीमा विवाद और टीटीपी (तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान) के मुद्दे पर पाकिस्तान और तालिबान प्रशासन के बीच संबंधों में भारी गिरावट आई है। पाकिस्तान ने बार-बार आरोप लगाया है कि अफगानिस्तान की धरती का इस्तेमाल उसके खिलाफ आतंकवादी हमलों के लिए किया जा रहा है। दूसरी ओर, अफगानिस्तान ने इन आरोपों को खारिज करते हुए भारत के साथ व्यापारिक और बुनियादी ढांचे के विकास पर ध्यान केंद्रित किया है।
धार्मिक कट्टरपंथ का इस्तेमाल कूटनीति में करना अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता का विषय बना हुआ है। भारत ने हमेशा यह रुख अपनाया है कि अफगानिस्तान के साथ उसके संबंध ऐतिहासिक और सांस्कृतिक हैं, जो किसी तीसरे देश के खिलाफ नहीं बल्कि अफगान जनता के कल्याण के लिए हैं। भारत द्वारा निर्मित सलमा बांध और वहां का संसद भवन इस बात के जीवंत प्रमाण हैं।
ऑस्ट्रेलिया में बसे भारतीय समुदाय के लिए यह घटनाक्रम काफी संवेदनशील है। मेलबर्न और सिडनी जैसे शहरों में रहने वाले दक्षिण एशियाई प्रवासियों के बीच क्षेत्रीय शांति और सुरक्षा हमेशा चर्चा का विषय रहती है। वहां के विशेषज्ञों का कहना है कि धर्म का इस तरह राजनीतिकरण न केवल दक्षिण एशिया की स्थिरता के लिए खतरा है, बल्कि यह चरमपंथी विचारधाराओं को भी बढ़ावा दे सकता है। ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में रह रहे भारतीय और अफगान समुदाय के लोग इस तरह की बयानबाजी को दोनों देशों के विकास में बाधक मानते हैं।
अंततः, पाकिस्तान की यह कोशिश भारत को अफगानिस्तान से अलग-थलग करने की एक हताशा भरी चाल नजर आती है। हालांकि, तालिबान प्रशासन ने अब तक आर्थिक हितों को धार्मिक विचारधारा से ऊपर रखने के संकेत दिए हैं, जो पाकिस्तान की इस रणनीति को विफल कर सकता है।
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