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तिरुपति मंदिर के 'श्रीवारी लड्डू प्रसाद' के पूरे हुए 311 साल: श्रद्धा और परंपरा का तीन शताब्दियों का सफर

ICN24 Newsroom 3 अग॰ 2026, 02:37 am
तिरुपति मंदिर के 'श्रीवारी लड्डू प्रसाद' के पूरे हुए 311 साल: श्रद्धा और परंपरा का तीन शताब्दियों का सफर

तिरुपति बालाजी मंदिर के विश्व प्रसिद्ध 'श्रीवारी लड्डू' ने अपनी शुरुआत के 311 साल पूरे कर लिए हैं। 2 अगस्त 1715 को पहली बार यह प्रसाद भगवान वेंकटेश्वर को अर्पित किया गया था।

आंध्र प्रदेश के तिरुमाला पर्वत पर स्थित भगवान वेंकटेश्वर के मंदिर का 'श्रीवारी लड्डू' मात्र एक मिठाई नहीं, बल्कि करोड़ों हिंदुओं की अटूट श्रद्धा का प्रतीक है। इस वर्ष यह विशेष प्रसाद अपनी शुरुआत के 311 गौरवशाली वर्ष पूरे कर रहा है। ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार, तिरुपति मंदिर में लड्डू प्रसाद चढ़ाने की परंपरा आधिकारिक रूप से 2 अगस्त 1715 को शुरू हुई थी। तीन शताब्दियों से अधिक समय बीत जाने के बाद भी, इस लड्डू के स्वाद, सुगंध और इसकी लोकप्रियता में कोई कमी नहीं आई है। इतिहासकारों के अनुसार, 1715 में पहली बार 'मोटी बूंदी' से तैयार लड्डू भगवान को नैवेद्यम के रूप में चढ़ाया गया था। उस समय मंदिर की पुरानी रसोई, जिसे 'पोटू' कहा जाता है, में इसे तैयार किया गया था। हालांकि समय के साथ इसकी निर्माण प्रक्रिया और सामग्री की मात्रा में कुछ बदलाव हुए, लेकिन इसकी मूल रेसिपी और शुद्धता को आज भी बरकरार रखा गया है। वर्तमान में इसे बनाने के लिए चने की दाल, शुद्ध घी, चीनी, इलायची, कपूर, किशमिश और बादाम का एक निश्चित अनुपात में उपयोग किया जाता है, जिसे 'दिट्टम' कहा जाता है। तिरुपति के इस लड्डू की विशेषता यह है कि इसे भारत सरकार द्वारा 'भौगोलिक संकेत' (GI Tag) प्रदान किया गया है। इसका अर्थ है कि केवल तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम (TTD) ही इस विशिष्ट नाम और स्वाद के साथ लड्डू का निर्माण और वितरण कर सकता है। प्रतिदिन मंदिर में लगभग 3 लाख से अधिक लड्डू तैयार किए जाते हैं, जिसके लिए आधुनिक मशीनों और पारंपरिक रसोइयों का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है। ऑस्ट्रेलिया में रह रहे भारतीय समुदाय के लिए भी तिरुपति लड्डू का विशेष महत्व है। सिडनी, मेलबर्न और पर्थ जैसे शहरों में रहने वाले हजारों प्रवासी जब भी भारत आते हैं, तिरुपति दर्शन और वहां का लड्डू प्रसाद लाना उनकी प्राथमिकता होती है। ऑस्ट्रेलिया में बसे भारतीय मूल के लोगों के लिए यह प्रसाद न केवल आध्यात्मिक जुड़ाव का माध्यम है, बल्कि यह उनकी सांस्कृतिक जड़ों की याद भी दिलाता है। कई बार विशेष धार्मिक आयोजनों के दौरान ऑस्ट्रेलियाई मंदिरों में भी तिरुपति शैली के लड्डू बनाने का प्रयास किया जाता है, लेकिन जो बात 'तिरुमाला पोटू' में तैयार लड्डू में है, वह अद्वितीय है। तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम (TTD) प्रशासन ने इस ऐतिहासिक अवसर पर लड्डू की गुणवत्ता और शुद्धता को लेकर अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है। बदलते समय के साथ, मंदिर प्रशासन ने अब लड्डू वितरण के लिए पर्यावरण के अनुकूल पैकेजिंग और डिजिटल टोकन जैसी व्यवस्थाएं भी लागू की हैं, ताकि दुनिया भर से आने वाले श्रद्धालुओं को असुविधा न हो। 311 वर्षों की यह यात्रा यह सिद्ध करती है कि परंपराएं जब शुद्धता और भक्ति के साथ निभाई जाती हैं, तो वे समय की सीमाओं को लांघ जाती हैं।
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