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कर्नाटक: सरकारी परिसरों में कार्यक्रमों के लिए अनुमति अनिवार्य, RSS की शाखाओं को लेकर छिड़ा नया सियासी विवाद

ICN24 Newsroom 14 अग॰ 2026, 05:37 pm
कर्नाटक: सरकारी परिसरों में कार्यक्रमों के लिए अनुमति अनिवार्य, RSS की शाखाओं को लेकर छिड़ा नया सियासी विवाद

कर्नाटक कैबिनेट ने सरकारी संपत्तियों के उपयोग को लेकर नया बिल मंजूर किया है, जिस पर बीजेपी ने आरएसएस को निशाना बनाने का आरोप लगाया है।

कर्नाटक की सिद्धारमैया सरकार ने राज्य में सरकारी संपत्तियों और सार्वजनिक परिसरों के उपयोग को विनियमित करने के लिए एक नए विधेयक को मंजूरी दी है। इस फैसले ने राज्य की राजनीति में एक नया विवाद खड़ा कर दिया है, क्योंकि विपक्षी भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने आरोप लगाया है कि यह कदम विशेष रूप से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की गतिविधियों, विशेषकर उनकी 'शाखाओं' को रोकने के लिए उठाया गया है। कैबिनेट के इस निर्णय के अनुसार, अब सरकारी स्कूलों, कॉलेजों और सार्वजनिक मैदानों जैसे परिसरों में किसी भी कार्यक्रम या गतिविधि के आयोजन के लिए संबंधित अधिकारियों से पूर्व अनुमति लेना अनिवार्य होगा। राज्य के राजस्व मंत्री कृष्णा बायरे गौड़ा ने स्पष्ट किया कि इस कानून का उद्देश्य सरकारी संपत्तियों के दुरुपयोग को रोकना और यह सुनिश्चित करना है कि सार्वजनिक स्थानों का उपयोग केवल उचित और कानूनी उद्देश्यों के लिए ही किया जाए। हालांकि, राजनीतिक गलियारों में इसे सीधे तौर पर आरएसएस की शाखाओं पर अंकुश लगाने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है, जो अक्सर स्थानीय स्कूलों या सार्वजनिक मैदानों में आयोजित की जाती हैं। बीजेपी नेताओं ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए इसे 'लोकतंत्र विरोधी' करार दिया है। विपक्ष के नेता आर. अशोक ने सरकार को चेतावनी देते हुए कहा कि कांग्रेस पार्टी हिंदुओं और आरएसएस को निशाना बना रही है। उन्होंने कहा, 'हम सरकार के इस तानाशाही रवैये के खिलाफ खड़े होंगे और उन्हें सबक सिखाएंगे। आरएसएस एक राष्ट्रवादी संगठन है और उसे रोकने की कोई भी कोशिश सफल नहीं होगी।' वहीं, कर्नाटक के ग्रामीण विकास और पंचायत राज मंत्री प्रियांक खड़गे ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि नियम सभी के लिए समान हैं। खड़गे ने तर्क दिया कि सार्वजनिक संपत्ति करदाताओं के पैसे से बनी है और उसका उपयोग किसी भी संगठन द्वारा बिना अनुमति के अपने निजी एजेंडे के लिए नहीं किया जाना चाहिए। ऑस्ट्रेलिया में बसे भारतीय समुदाय के लिए भारत की राज्य-स्तरीय राजनीति हमेशा से चर्चा का विषय रही है। विशेष रूप से कर्नाटक, जो भारत का प्रमुख आईटी हब है, वहां की नीतियों का प्रभाव वैश्विक निवेश और प्रवासियों के सामाजिक दृष्टिकोण पर पड़ता है। ऑस्ट्रेलिया में सक्रिय कई हिंदू संगठन और प्रवासी समूह इस घटनाक्रम को भारत में नागरिक स्वतंत्रता और सांगठनिक अधिकारों के चश्मे से देख रहे हैं। सिडनी और मेलबर्न में रहने वाले कन्नड़ समुदाय के लोग भी सोशल मीडिया पर इस मुद्दे पर अपनी राय साझा कर रहे हैं, जहाँ कुछ लोग इसे प्रशासनिक सुधार मान रहे हैं, तो कुछ इसे वैचारिक भेदभाव। यह विवाद आने वाले विधानसभा सत्र में और गहराने की संभावना है। जहाँ एक ओर कांग्रेस सरकार इसे सुशासन और पारदर्शिता का हिस्सा बता रही है, वहीं बीजेपी इसे आगामी चुनावों से पहले ध्रुवीकरण की राजनीति के रूप में पेश कर रही है। फिलहाल, इस बिल के लागू होने के बाद जमीन पर इसकी क्रियान्वयन प्रक्रिया ही यह तय करेगी कि यह सामान्य प्रशासनिक आदेश है या इसके पीछे कोई गहरा राजनीतिक निहितार्थ है।
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