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कर्नाटक: संख्या बल की कमी के बावजूद विपक्ष ने पी.एच. पुजार को विधान परिषद सभापति पद के लिए उतारा

ICN24 Newsroom 14 अग॰ 2026, 10:37 am
कर्नाटक: संख्या बल की कमी के बावजूद विपक्ष ने पी.एच. पुजार को विधान परिषद सभापति पद के लिए उतारा

कर्नाटक में भाजपा-जेडी(एस) गठबंधन ने पर्याप्त संख्या बल न होने के बावजूद विधान परिषद सभापति पद के लिए पी.एच. पुजार को उम्मीदवार बनाया है, जिससे राज्य में राजनीतिक हलचल तेज हो गई है।

कर्नाटक की राजनीति में एक बार फिर सरगर्मी बढ़ गई है। राज्य की मुख्य विपक्षी पार्टी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और उसके सहयोगी दल जनता दल (सेक्यूलर) यानी जेडी(एस) ने विधान परिषद के सभापति पद के लिए पी.एच. पुजार को अपना आधिकारिक उम्मीदवार घोषित किया है। यह कदम राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है क्योंकि ऊपरी सदन में विपक्ष के पास चुनाव जीतने के लिए आवश्यक जादुई आंकड़ा मौजूद नहीं है। नामांकन दाखिल करने की प्रक्रिया के दौरान भाजपा और जेडी(एस) के वरिष्ठ नेता मौजूद रहे। विपक्ष के इस निर्णय को सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी के खिलाफ एक प्रतीकात्मक विरोध और अपनी एकजुटता दिखाने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है। कर्नाटक विधान परिषद में वर्तमान में कांग्रेस के पास स्पष्ट बहुमत की स्थिति है, जिससे पुजार की जीत की संभावनाएं तकनीकी रूप से काफी कम नजर आती हैं। फिर भी, चुनावी मैदान में उतरने का फैसला यह दर्शाता है कि विपक्ष सदन के भीतर सरकार को आसानी से 'वॉकओवर' देने के मूड में नहीं है। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि पी.एच. पुजार को उम्मीदवार बनाकर भाजपा-जेडी(एस) गठबंधन अपने कैडर को यह संदेश देना चाहता है कि वे सत्ता पक्ष की हर गतिविधि पर कड़ी नजर रखे हुए हैं। विधान परिषद का सभापति पद अत्यंत महत्वपूर्ण होता है क्योंकि सदन की कार्यवाही और विधायी कार्यों के संचालन में उनकी भूमिका निर्णायक होती है। विपक्ष की योजना संभवतः सदन के पटल पर सरकार की घेराबंदी करने और आगामी विधायी विधेयकों पर कड़ा रुख अख्तियार करने की है। सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी ने विपक्ष के इस कदम पर प्रतिक्रिया देते हुए इसे 'हताशा' करार दिया है। कांग्रेस नेताओं का तर्क है कि जब विपक्ष के पास पर्याप्त सदस्य ही नहीं हैं, तो चुनाव लड़ने का कोई तर्क नहीं बनता। हालांकि, सदन के भीतर मतदान की प्रक्रिया केवल जीत-हार तक सीमित नहीं होती, बल्कि यह गठबंधन की आंतरिक मजबूती और सदस्यों की निष्ठा को भी परखने का एक जरिया होती है। कर्नाटक की यह राजनीतिक हलचल ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले भारतीय समुदाय, विशेष रूप से कन्नड़ प्रवासियों के लिए भी विशेष महत्व रखती है। सिडनी, मेलबर्न और पर्थ जैसे शहरों में रहने वाले प्रवासी भारतीय अपने गृह राज्य की राजनीतिक स्थिरता और विकास नीतियों पर बारीकी से नजर रखते हैं। कर्नाटक के राजनीतिक घटनाक्रमों का असर अक्सर वहां की निवेश नीतियों और प्रवासी हितों पर भी पड़ता है, जिसके कारण ऑस्ट्रेलिया में सक्रिय कन्नड़ संगठन इन बदलावों पर चर्चा कर रहे हैं। आने वाले दिनों में होने वाले इस चुनाव से यह स्पष्ट हो जाएगा कि कर्नाटक की राजनीति किस दिशा में मुड़ रही है। क्या कांग्रेस अपनी रणनीति को सफलतापूर्वक लागू कर पाएगी, या विपक्ष अपनी इस प्रतीकात्मक लड़ाई के जरिए कोई बड़ा राजनीतिक संदेश देने में कामयाब होगा, यह देखना दिलचस्प होगा। फिलहाल, पी.एच. पुजार का नामांकन भाजपा-जेडी(एस) गठबंधन की 'आक्रामक राजनीति' का एक नया अध्याय माना जा रहा है।
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