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भक्ति या प्रदर्शन? पंडित विजयशंकर मेहता ने बताया ईश्वर के प्रति समर्पण का वास्तविक मार्ग
ICN24 Newsroom 4 जुल॰ 2026, 12:31 pm
प्रसिद्ध आध्यात्मिक गुरु पंडित विजयशंकर मेहता के अनुसार, ईश्वर को हृदय की मौन प्रार्थना प्रिय है, आडंबर नहीं। कबीर और मीरा के उदाहरणों से उन्होंने भक्ति की गहराई को समझाया है।
भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में भक्ति का स्वरूप हमेशा से चर्चा का विषय रहा है। हाल ही में अपने विचारों को साझा करते हुए प्रसिद्ध आध्यात्मिक व्याख्याता पंडित विजयशंकर मेहता ने स्पष्ट किया है कि ईश्वर को प्रदर्शन नहीं, बल्कि सच्ची प्रार्थना पसंद है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि भक्ति एक अत्यंत निजी और आंतरिक यात्रा है, जिसे अक्सर बाहरी कर्मकांडों और प्रदर्शन की भेंट चढ़ा दिया जाता है। ऑस्ट्रेलिया जैसे पश्चिमी देशों में रह रहे भारतीय समुदाय के लिए यह संदेश विशेष रूप से प्रासंगिक है, जहां व्यस्त जीवनशैली के बीच आध्यात्मिक संतुलन बनाए रखना एक चुनौती है।
पंडित मेहता ने कबीर और मीराबाई जैसे महान संतों का उदाहरण देते हुए कहा कि भक्ति की पराकाष्ठा वह है, जहां भक्त स्वयं को ईश्वर में लीन कर देता है। उन्होंने उल्लेख किया कि कबीर के अंतिम समय का रहस्य उनके पीछे छोड़े गए फूलों में ही सिमट कर रह गया, और मीराबाई किस तरह मूर्ति में अंतर्धान हो गईं, इसका कोई भौतिक प्रमाण आज भी उपलब्ध नहीं है। ये उदाहरण दर्शाते हैं कि वास्तविक भक्त कभी अपनी भक्ति का ढोल नहीं पीटता, बल्कि वह अपने आराध्य के साथ एक ऐसे एकांत संवाद में होता है, जिसे दुनिया नहीं देख सकती।
लेख में मंदिर और तीर्थों की भूमिका को भी स्पष्ट किया गया है। मेहता जी के अनुसार, मंदिर और तीर्थ केवल पहला कदम हो सकते हैं। वे हमें अनुशासन और श्रद्धा की शुरुआत सिखाते हैं, लेकिन उसके बाद की यात्रा भक्त को स्वयं तय करनी होती है। उन्होंने कहा, 'आप जीवन भर किसी मंदिर की दीवारों के भीतर सीमित नहीं रह सकते। भक्ति आपको स्वतंत्र करती है।' यह विचार सिडनी, मेलबर्न और पर्थ जैसे शहरों में रहने वाले उन भारतीयों के लिए महत्वपूर्ण है, जो शायद नियमित रूप से मंदिरों में नहीं जा पाते, लेकिन अपने घर के छोटे से मंदिर या 'मानस पूजा' के माध्यम से अपनी जड़ों से जुड़े रहते हैं।
वर्तमान समय में सोशल मीडिया और डिजिटल दिखावे के युग में भक्ति का 'प्रदर्शन' बढ़ गया है। लोग प्रार्थना से अधिक उसकी प्रस्तुति पर ध्यान देते हैं। पंडित मेहता का यह स्तंभ एक चेतावनी की तरह है कि ईश्वर बाहरी चकाचौंध से प्रभावित नहीं होता। सच्ची भक्ति वह है जो मौन में फले-फूले। उन्होंने अंत में कहा कि भक्ति के लिए किसी विशिष्ट स्थान या भव्यता की आवश्यकता नहीं है; आवश्यकता है तो बस एक निर्मल मन की, जो प्रदर्शन के मोह से मुक्त हो।
ऑस्ट्रेलियाई डायस्पोरा के लिए यह दर्शन एक सरल मार्ग प्रस्तुत करता है। काम और पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच, पंडित मेहता का यह दृष्टिकोण सिखाता है कि भक्ति को एक अतिरिक्त कार्य बनाने के बजाय उसे जीवन जीने का एक सहज तरीका बनाया जाना चाहिए। ईश्वर आपके भीतर है, और उस तक पहुँचने के लिए केवल एक सच्ची, आडंबरहीन पुकार की आवश्यकता है।
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