राजनीति
JPSC नियुक्तियों पर हाईकोर्ट की रोक: छात्र नेताओं ने हेमंत सोरेन सरकार पर लगाया 'विश्वासघात' का आरोप
ICN24 Newsroom 21 अग॰ 2026, 05:37 am

झारखंड उच्च न्यायालय द्वारा JPSC नियुक्तियों को रद्द करने के फैसले पर रोक लगाने के बाद छात्र संगठनों ने सरकार पर मामले को जानबूझकर कमजोर करने का आरोप लगाया है।
झारखंड की राजनीति में एक बार फिर नियुक्तियों और परीक्षाओं की अनियमितताओं को लेकर उबाल देखा जा रहा है। झारखंड उच्च न्यायालय ने हाल ही में राज्य सरकार के उस आदेश पर रोक लगा दी है, जिसमें 11वीं और 13वीं झारखंड लोक सेवा आयोग (JPSC) की नियुक्तियों को रद्द करने की बात कही गई थी। इस न्यायिक हस्तक्षेप के तुरंत बाद, राज्य के छात्र नेताओं और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे युवाओं ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के नेतृत्व वाली सरकार पर 'धोखाधड़ी' और 'दोहरी चाल' चलने का गंभीर आरोप लगाया है।
आंदोलनकारी छात्र नेताओं का तर्क है कि सरकार ने जनता के दबाव में नियुक्तियां रद्द करने का दिखावा तो किया, लेकिन अदालत के सामने इस फैसले का बचाव करने के लिए पर्याप्त कानूनी तर्क पेश नहीं किए। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि यह सरकार की एक सोची-समझी रणनीति है ताकि नियुक्तियों में हुई धांधली को कानूनी पेचों में उलझाकर पर्दे के पीछे से भ्रष्टाचार को बढ़ावा दिया जा सके। छात्र संगठनों का आरोप है कि सरकार की ओर से पेश हुए वकीलों ने उन ठोस सबूतों को अदालत के समक्ष नहीं रखा, जिनके आधार पर पहले नियुक्तियां रद्द करने की सिफारिश की गई थी।
झारखंड के छात्र पिछले कई वर्षों से भर्ती परीक्षाओं में पारदर्शिता की मांग कर रहे हैं। राज्य में 'नौकरी और नियुक्ति' का मुद्दा आगामी विधानसभा चुनावों में एक निर्णायक भूमिका निभाने वाला है। छात्र नेताओं ने स्पष्ट किया है कि यदि सरकार ने इस मामले में ईमानदारी से कार्रवाई नहीं की, तो वे राज्यव्यापी आंदोलन तेज करेंगे। उनका कहना है कि मेधावी छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है और राजनीतिक लाभ के लिए सिस्टम का दुरुपयोग हो रहा है।
ऑस्ट्रेलिया में रह रहे प्रवासी भारतीय समुदाय (विशेषकर वे जो झारखंड से ताल्लुक रखते हैं) के लिए यह समाचार चिंता का विषय है। सिडनी और मेलबर्न जैसे शहरों में बसे कई झारखंडी परिवारों के छोटे भाई-बहन या रिश्तेदार इन परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं। ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले भारतीय मूल के लोग अक्सर अपने गृह राज्य के शासन और रोजगार के अवसरों पर नजर रखते हैं। उनका मानना है कि पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया ही राज्य के विकास का आधार है, और ऐसी कानूनी विफलताएं युवाओं के मनोबल को प्रभावित करती हैं।
वर्तमान में, उच्च न्यायालय के स्थगन आदेश का अर्थ है कि रद्द की गई नियुक्तियां फिलहाल ठंडे बस्ते में चली गई हैं या फिर उनके बहाल होने की संभावना बढ़ गई है। हेमंत सोरेन सरकार के लिए यह स्थिति गले की फांस बनती जा रही है। एक तरफ उन पर धांधली रोकने का दबाव है, तो दूसरी तरफ उन अभ्यर्थियों का पक्ष है जिनकी नियुक्तियां अब कानूनी विवाद में हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस विवाद का असर सीधे तौर पर सरकार की छवि पर पड़ रहा है, जिसे युवा विरोधी करार देने की कोशिश विपक्ष भी कर रहा है।
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