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संघ प्रमुख मोहन भागवत के दौरे से पहले घमासान: क्या अमेरिका में RSS पर लगेगा प्रतिबंध? USCIRF की सख्त सिफारिश
ICN24 Newsroom 21 अग॰ 2026, 01:37 am

अमेरिकी आयोग (USCIRF) ने जो बाइडन सरकार से आरएसएस पर प्रतिबंध लगाने और संघ नेताओं को कूटनीतिक प्रोटोकॉल न देने की मांग की है, जिससे अंतरराष्ट्रीय राजनीति में हलचल मच गई है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक मोहन भागवत की प्रस्तावित अमेरिका यात्रा से पहले वाशिंगटन के राजनीतिक गलियारों में सरगर्मी तेज हो गई है। अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता पर अमेरिकी आयोग (USCIRF) ने जो बाइडन प्रशासन से एक बेहद सख्त सिफारिश की है, जिसमें आरएसएस पर प्रतिबंध लगाने और इसके शीर्ष नेतृत्व को किसी भी प्रकार का कूटनीतिक प्रोटोकॉल या सम्मान न देने की बात कही गई है। यह घटनाक्रम ऐसे समय में आया है जब भारत और अमेरिका के बीच रणनीतिक संबंध नई ऊंचाइयों पर हैं, लेकिन साथ ही मानवाधिकारों और धार्मिक स्वतंत्रता के मुद्दों पर कुछ अमेरिकी संस्थाएं लगातार सवाल उठा रही हैं।
USCIRF, जो एक द्विदलीय संघीय निकाय है, ने अपनी रिपोर्ट में तर्क दिया है कि संघ की विचारधारा और गतिविधियां धार्मिक अल्पसंख्यकों के अधिकारों के लिए प्रतिकूल हैं। आयोग ने अमेरिकी विदेश विभाग से अनुरोध किया है कि आरएसएस को एक 'विशेष चिंता वाली इकाई' (Entity of Particular Concern) के रूप में नामित किया जाए। इस सिफारिश के तहत न केवल संगठन पर आर्थिक और कानूनी प्रतिबंधों की बात कही गई है, बल्कि इसके प्रमुख नेताओं के लिए वीजा प्रतिबंधों और आधिकारिक दौरों के दौरान किसी भी सरकारी प्रोटोकॉल से वंचित रखने का सुझाव भी शामिल है।
हालांकि, यह ध्यान देना महत्वपूर्ण है कि USCIRF केवल एक सलाहकार निकाय है। इसकी सिफारिशें अमेरिकी विदेश विभाग (State Department) के लिए बाध्यकारी नहीं होती हैं। अतीत में भी, आयोग ने भारत के संबंध में कई सख्त टिप्पणियां की हैं, जिन्हें भारत सरकार ने अक्सर 'पक्षपाती' और 'भारत विरोधी एजेंडा' करार देकर खारिज किया है। भारतीय विदेश मंत्रालय का रुख हमेशा से रहा है कि बाहरी संस्थाओं को भारत के आंतरिक मामलों और लोकतांत्रिक ढांचे में हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं है।
ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले भारतीय समुदाय के लिए यह खबर विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। ऑस्ट्रेलिया में भी आरएसएस से प्रेरित कई सामाजिक और सांस्कृतिक संगठन सक्रिय हैं। जब भी अमेरिका जैसे शक्तिशाली देश में इस तरह की मांगें उठती हैं, तो उसका प्रभाव अन्य पश्चिमी देशों के भारतीय प्रवासियों और वहां के राजनीतिक विमर्श पर भी पड़ता है। सिडनी और मेलबर्न में रहने वाले प्रवासी भारतीय अक्सर इन अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों को वैश्विक स्तर पर भारत की छवि को प्रभावित करने के प्रयास के रूप में देखते हैं।
फिलहाल, बाइडन प्रशासन की ओर से इस सिफारिश पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान भू-राजनीतिक परिस्थितियों में, जहां अमेरिका को हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत की सख्त जरूरत है, वह संघ जैसे प्रभावशाली संगठन पर प्रतिबंध लगाकर भारत के साथ अपने रिश्तों में खटास नहीं डालना चाहेगा। फिर भी, मोहन भागवत के दौरे के दौरान वाशिंगटन में विरोध प्रदर्शनों और राजनीतिक बयानबाजी की संभावना बनी हुई है, जिस पर पूरी दुनिया की नजर रहेगी।
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