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गाजा और लेबनान में इजरायल की 'नो रिटर्न' नीति से बढ़ा तनाव, क्या ईरान के साथ छिड़ेगा पूर्ण युद्ध?

ICN24 Newsroom 3 जुल॰ 2026, 03:31 am
गाजा और लेबनान में इजरायल की 'नो रिटर्न' नीति से बढ़ा तनाव, क्या ईरान के साथ छिड़ेगा पूर्ण युद्ध?

इजरायल की नई सैन्य रणनीति और सीमावर्ती क्षेत्रों में स्थायी नियंत्रण की आहट ने पश्चिम एशिया में युद्ध की आशंकाओं को गहरा दिया है, जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था और सुरक्षा पर संकट मंडरा रहा है।

पश्चिम एशिया में एक बार फिर युद्ध के बादल गहरे होते जा रहे हैं। इजरायल द्वारा गाजा, दक्षिणी लेबनान और सीरिया के कुछ हिस्सों में अपनाई जा रही ‘नो रिटर्न’ (वापसी नहीं) की नीति ने क्षेत्र में तनाव को एक नए और खतरनाक स्तर पर पहुंचा दिया है। इस नीति का सरल अर्थ यह है कि इजरायली रक्षा बल (IDF) अब उन क्षेत्रों से पीछे हटने के मूड में नहीं हैं, जिन्हें उन्होंने सुरक्षा बफर जोन के रूप में चिन्हित किया है। इस रणनीतिक बदलाव ने न केवल अरब जगत, बल्कि ईरान को भी सीधे टकराव के लिए उकसाया है। यरुशलम से आई रिपोर्टों के अनुसार, इजरायली सेना गाजा के उत्तरी हिस्सों और लेबनान के सीमावर्ती गांवों में बुनियादी ढांचे को इस तरह से ध्वस्त या पुनर्गठित कर रही है कि वहां विस्थापित नागरिकों की वापसी लगभग असंभव हो गई है। इजरायली नेतृत्व का तर्क है कि सीमावर्ती क्षेत्रों में सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए यह एक आवश्यक कदम है ताकि भविष्य में 7 अक्टूबर जैसे हमलों को रोका जा सके। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय समुदाय इसे कब्जे के विस्तार के रूप में देख रहा है, जिससे शांति वार्ता की संभावनाएं धूमिल हो गई हैं। इधर, तेहरान से आ रही चेतावनियों ने इस आग में घी डालने का काम किया है। ईरान ने स्पष्ट किया है कि यदि इजरायल ने सीरिया या लेबनान में अपने प्रभाव क्षेत्र का विस्तार जारी रखा, तो वह मूकदर्शक नहीं बना रहेगा। हाल के सप्ताहों में ईरान और इजरायल के बीच सीधे मिसाइल हमलों के आदान-प्रदान ने यह साबित कर दिया है कि अब यह छद्म युद्ध (Proxy War) नहीं, बल्कि एक सीधी सैन्य भिड़ंत में बदल सकता है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ईरान ने फिर से हमला किया, तो इजरायल की प्रतिक्रिया पहले से कहीं अधिक व्यापक और विनाशकारी हो सकती है, जो सीधे ईरान के परमाणु या तेल प्रतिष्ठानों को निशाना बना सकती है। ऑस्ट्रेलिया में रह रहे भारतीय समुदाय के लिए यह घटनाक्रम चिंता का विषय बना हुआ है। ऑस्ट्रेलिया में एक बड़ी आबादी ऐसी है जिनके परिवार या व्यावसायिक हित खाड़ी देशों (Gulf countries) से जुड़े हैं। पश्चिम एशिया में किसी भी बड़े युद्ध का सीधा असर ऑस्ट्रेलिया में ईंधन की कीमतों और आपूर्ति श्रृंखला (Supply chain) पर पड़ेगा। इसके अलावा, मेलबर्न और सिडनी जैसे शहरों में रहने वाले भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई नागरिक इस बात को लेकर चिंतित हैं कि बढ़ते तनाव का असर उनके उन रिश्तेदारों पर क्या होगा जो काम के सिलसिले में दुबई, कतर या सऊदी अरब में बसे हुए हैं। कैनबरा में ऑस्ट्रेलियाई विदेश मंत्रालय (DFAT) स्थिति पर करीबी नजर रखे हुए है और नागरिकों को प्रभावित क्षेत्रों की यात्रा न करने की सलाह दी जा रही है। भारत ने भी हमेशा से क्षेत्र में संयम और बातचीत के जरिए समाधान निकालने की वकालत की है। वर्तमान स्थिति को देखते हुए यह कहना कठिन है कि कूटनीति के लिए अब कोई जगह बची है या नहीं। यदि तनाव इसी गति से बढ़ता रहा, तो दुनिया को एक और बड़े मानवीय और आर्थिक संकट का सामना करना पड़ सकता है, जिसका असर पश्चिम एशिया की सीमाओं से कहीं आगे तक महसूस किया जाएगा।
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